भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 828, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 828

वह सात्विक तुझसे ज्ञात । इसलिये त्रिगुणकी बात । सांख्य शास्त्रमें जो है कथित । कहता हूं तुझे ॥ १९ ॥ वह विचार क्षीर समुद्र । स्वबोध कुमुदिनीका चंद्र । ज्ञान-जागृतोंका जो नरेंद्र । शास्त्रोंका है ॥ ५२० ॥ अथवा प्रकृति पुरुष ये दोन । घुल गये जैसे रात और दिन । त्रिभुवनमें उसे दिखाता कर भिन्न । मार्तंड जैसे ॥ २१ ॥ जहां मोहरात्री है अपार । चोवीस तत्त्वोंसे गिनकर । निरास करके धनुर्धर । रहे सुखसे ॥ २२ ॥ अर्जुन ! यह सांख्यशास्त्र । पढते हैं जिसके स्तोत्र । वह गुण भेद चरित्र । है इस भांति ॥ २३ ॥ अपने ही गुण भेदसे । त्रिविधपनकी मुद्रासे । विश्वमें जो दृश्य है उसे । किया मुद्रित ॥ २४ ॥ सत्व रज तम हैं ऐसे । तीनोंकी महिमा भी ऐसे । विविध जो आदि ब्रह्मासे । अंतमें है कृमितक ॥ २५ ॥ किंतु है विश्वके सभी समुदाय । जिसके भेदसे भेदते समय । उस ज्ञानका कैसे हुवा उदय । पहले उसे कहता ॥ २६ ॥ दृष्टिको जब शुद्ध किया जाता । तब सभी है शुद्ध ही दीखता । वैसे ही जब ज्ञान शुद्ध होता । सब है शुद्ध ॥ २७ ॥ इसीलिये वह सात्विक ज्ञान । कहता हूं उसको अब सुन । ऐसे हैं कैवल्य गुण निधान । श्रीकृष्ण कहता ॥ २८ ॥ सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥ अब कहता मैं तुझसे अर्जुन । शुद्ध जो वास्तविक सात्विक ज्ञान । उदयसे नाश करता है जान । ज्ञेय सह ज्ञानको ॥ २९ ॥ जो देखे भूत मात्रोंमें भाव एक सनातन । अभिन्न भेदमें देख जान जो ज्ञान सात्विक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ७५६

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