ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया नाना प्रभा जैसे प्रकाश । या मधुरतासे इक्षु-रस । या आकाश जैसे अवकाश । घिरा रहता है ॥ ९ ॥ वैसे कर्ताकी सभी क्रिया । व्याप लेती है धनंजय । उसको कर्म नाम दिया । अन्यको नहीं ॥ ५१० ॥ ऐसे कर्ता कर्म कारण । इन तीनोंके जो लक्षण । कहे हैं तुझसे अर्जुन । चातुर्यनिधि ॥ ११ ॥ यहां ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय । ये हैं कर्मके प्रवृत्तित्रय । वैसे ही कर्ता कारण कार्य । कर्म संचय यह ॥ १२ ॥ अग्निमें रखा जैसे धूम । तथा बीजमें जैसे द्रुम । वैसे मनसे जुडा काम । सदैवही ॥ १३ ॥ वैसे कर्म क्रिया कारण । कर्मका रहा है जीवन । जैसे सुवर्ण ही जीवन । स्वर्णमात्रका ॥ १४ ॥ इसीलिये यह कार्य मैं कर्ता । ऐसे भाव यहां है पांडुसुता । वहां भी आत्मा दूरही रहता । सभी क्रियाओंसे ॥ १५ ॥ इसीलिये जान तू अर्जुन । आत्मा रहता कर्मसे भिन्न । जाने दे अब यह कथन । सुनेगा कितना तू ॥ १६ ॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥ ज्ञान कर्म कर्ता भी त्रिगुणसे घिरे हैं— किंतु कहा जो ज्ञान । कर्म कर्ता ये तीन । इनमें गुण तीन । भिन्न हैं जो ॥ १७ ॥ इसलिये ज्ञान कर्म कर्ता । इसी पर न भूलना पार्था । एक है जो छुटकारा देता । और दो बंधन ॥ १८ ॥ ज्ञान औ' कर्म कर्तामें तीन भेद त्रिगुणसे । रचे हैं सुन तू कैसे गुण तत्त्वज्ञने कहे ॥ १९ ॥ ७५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग