ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 826, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैसे इस चेष्टाके कारण । ज्ञाताको घिरता कर्तापन । वहांके जो उसके लक्षण । सुन तू अब ॥ ९७ ॥ अंतःकरणका विवेचन— यहां बुद्धि और मन । चित्त अहंकार जान । ये हैं चतुर्विध चिन्ह । अंतःकरणके ॥ ९८ ॥ बाहर त्वचा और श्रवण । नयन रसना और घ्राण । ये हैं जो पंच-विध अर्जुन । ज्ञानकी इंद्रिया ॥ ९९ ॥ तब जो कर्ता जीव अर्जुन । ले अंतःकरणके साधन । करके कर्मका विचारण । यदि वह सुख हो ॥ ५०० ॥ जगा करके तब बाह्य । चक्षुरादि दस इंद्रिय । कर्ममें वह धनंजय । लगता त्वरित ॥ १ ॥ फिर वह इंद्रिय कवृंब । लगा देता है कर्ममें सब । जब तक कर्म-फल लाभ । हाथ न आता ॥ २ ॥ या किसी कर्तव्यमें सुख । फलेगा वह नहीं देख । कर देता है पराङ्मुख । इंद्रियोंको वह ॥ ३ ॥ जब तक लगान नहीं मिलता । राजा किसानको काममें जुताता । वैसे दुखका नाम भी न मिटता । जोतता इंद्रियोंको ॥ ४ ॥ कर्ता कारण और कर्म— ऐसे त्याग और स्वीकार । इंद्रियोंकी धुराको धर । करता उसे धनुर्धर । कहते हैं कर्ता ॥ ५ ॥ तथा कर्ताके सभी काम । करते जो स-परिश्रम । उन इंद्रियोंको हम । कहते हैं कारण ॥ ६ ॥ इन्ही कारणों पर जो कर्ता । सभी क्रियाओंको उभारता । उन क्रियाओंसे जो घिरता । वह है कर्म ॥ ७ ॥ सुनारकी बुद्धिसे जैसे आभूषण । घिरते चंद्रको जैसे चंद्रकिरण । तथा विलासतासे लता वृक्षगण । घेरते जैसे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५४