भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 825

आकाशमें उड़ता कबूतर । कबूतरीको वहां देखकर । छोड़ता अपना सारा शरीर । उसपे जैसे ॥ ८३ ॥ अथवा सुनकर मेघ गर्जन । मयूर उड़ना चाहता गगन । वैसे ही ज्ञेय देखकर अर्जुन । दौड़ता ज्ञाता ॥ ८४ ॥ इसीलिये ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता । विविध हैं जो पांडुसुता । होते हैं यहां कर्मको समस्त । प्रवृत्त सदैव ॥ ८५ ॥ होता है यदि ज्ञेय प्रिय । ज्ञाताको वह धनंजय । भोगमें न खोता समय । क्षणका भी वह ॥ ८६ ॥ तथा होता यदि अप्रिय । तजता सबका समय । आया जैसे जग-प्रलय । मानता वह ॥ ८७ ॥ व्याल है अथवा हार । इस संशयमें नर । हर्षसे डालता कर । औ' कांप उठता ॥ ८८ ॥ ऐसे है ज्ञेयका प्रियाप्रिय । देख होता ज्ञाता धनंजय । स्वीकार या तजते समय । होता है प्रवृत्त ॥ ८९ ॥ अनुरागी जो प्रतिमल्लका । सेनापति संपूर्ण सैन्यका । आता है त्याग कर रथका । भूमि पर जैसे ॥ ४९० ॥ वैसे ज्ञातापनसे जो होता । वह कर्तापनमें है आता । नितही जो अनायास खाता । बैठता रसोईमें ॥ ९१ ॥ या भ्रमका ऐसे बाग लगाता । स्वर्णकारही कसौटी बनता । या भगवंत ही है राज बनता । घड़ने मंदिर ॥ ९२ ॥ ज्ञेयकी लालसा धर ऐसे । ज्ञाता कराता है इंद्रियोंसे । व्यवहार सभी प्रकारसे । होकर कर्ता ॥ ९३ ॥ तथा स्वयं आप होकर कर्ता । ज्ञानमें लाता जब सधनता । वहां ज्ञेयही होता स्वभावता । कार्य धनंजय ॥ ९४ ॥ ज्ञानकी ऐसी निजगति । पलटती जो इस भांति । रात्रिमें जैसे नेत्र-कांति । पलटती है ॥ ९५ ॥ अथवा होता जब वैष उदास । उतरता है श्रीमंतका विलास । पूर्णिमाके नंतर जैसे चंद्रांश । उतरता आता ॥ ९६ ॥ (87) ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग