भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 824

आते ही ज्ञेयका सीमा-स्थान । जिसकी दौड सकती जान । तभी सभी वस्तुको अर्जुन । देता है नाम ॥ ४७० ॥ कहाता यह सामान्य ज्ञान । इसमें अन्यथा नहीं जान । सुन तू ज्ञेयका अब लक्षण । मुझसे अब ॥ ७१ ॥ अजी ! शब्द स्पर्श । रूप गंध रस । ये पांच आभास । ज्ञेयके हैं ॥ ७२ ॥ एक ही अमृत फल जैसे । इंद्रियोंको भिन्न रूपसे । रस वर्ण गंध स्पर्शसे । मिलता है ॥ ७३ ॥ ऐसे ज्ञेय है एकसर । किंतु ज्ञान इंद्रिय द्वारा । लेता तब होते प्रकार । यहां पांच ॥ ७४ ॥ प्रवाहका जैसे समुद्रमें जाना । रुकना पड़ावके आनेपे चलना । भुट्टा आने पर बढ़ना रुकना । सस्यका पार्थ ॥ ७५ ॥ इंद्रियोंसे ऐसे जो दौडता । वह ज्ञान जहां है रुकता । उसीको है ज्ञेय कहा जाता । धनुर्धर यहां ॥ ७६ ॥ ऐसे हैं ये ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । तीन रूप हुए धनंजय । यह सब है त्रिविध क्रिया । प्रवृत्तिकी जान ॥ ७७ ॥ जो है शब्दादि विषय । यह पंचविध ज्ञेय । वही है प्रिय अप्रिय । एक प्रकारसे ॥ ७८ ॥ ज्ञाताको जिस समय ज्ञान । करता है अल्पसा दर्शन । स्वीकार या तजनेमें अर्जुन । होता प्रवृत्त ॥ ७९ ॥ किंतु जैसे मीन देख बक । तथा निदान देखके रंक । अथवा स्त्रीको देख कामुक । होता प्रवृत्त ॥ ४८० ॥ अथवा उतार पर नीर । परिमल पर है भ्रमर । या गायके पास धनुर्धर । दौडता बछडा ॥ ८१ ॥ स्वर्गकी उर्वशीका विषय । सुनकर जैसे धनंजय । नभमें सीढी लगाता मनुष्य । यज्ञ यागकी ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५२