भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किंतु जहां अज्ञानके पट पर । अन्यथा ज्ञानका चित्र उठाकर । दिखानेमें प्रसिद्ध धनुर्धर । त्रिपुटी जो अन्य ॥ ४६० ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन— जो है ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । जगके ये बीज त्रय । कर्मकी ये निःसंशय । प्रवृत्ति जो ॥ ६१ ॥ अब जो यह है तीन । विषय हैं भिन्न भिन्न । उनका करें वर्णन । स्पष्ट रूपसे ॥ ६२ ॥ जैसे जीव सूर्य-बिंबका । रश्मिजाल जो श्रोत्रादिका । खिलाते विषय पद्मका । मुकुल-वृंद ॥ ६३ ॥ जीव नृपका घोड़ा खुला हुवा । इंद्रियोंका समूह लिया हुवा । विषय देश लूटता पांडवा । सुखदुःखादिक ॥ ६४ ॥ इन इंद्रियोंसे कराता व्यापार । सुखदुःखानुभव देता लाकर । सुषुप्ति कालमें जो लीन होकर । रहता है ज्ञान ॥ ६५ ॥ उस जीवको कहते ज्ञाता । इसको मैं अब जो कहता । पहले छंदमें जो कहा था । वह है ज्ञान ॥ ६६ ॥ अविद्याके उदरमें । उपजते समयमें । कर देता जो आपमें । तीन भाग ॥ ६७ ॥ फिर अपनी दौड़के सम्मुख । बांध डालते ज्ञेय विषयक । पीछेका भाग जो है ज्ञातृत्वका । उठा देता है ॥ ६८ ॥ ज्ञाता ज्ञेयके मध्यमें फिर । ज्ञानके रहनेका प्रकार । जिससे दोनोंका व्यवहार । चलता रहता है ॥ ६९ ॥ ज्ञाता ज्ञेय तथा कर्म तिहरा कर्म-बीज है । क्रिया कारण कर्तृत्व तीन कर्मांग है उसे ॥ १८ ॥ ७५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग