ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया वज्र प्रहार कर गगन । तुकडे करे भूतल अर्जुन । या मेघ-वर्षासे नंदनवन । बनाये यह भूमि ॥ ३४ ॥ किंतु इन दोनोंको जैसे । न जानता आकाश वैसे । देहमें रहती है वैसे । विदेह दृष्टि ॥ ३५ ॥ देहादिमें चेष्टा न करता । या विश्व बनता या टूटता । यह भी वह नहीं देखता । जैसे जगता स्वप्न ॥ ३६ ॥ किंतु जो चर्म-चक्षु देखते । तथा देह-भावसे है देखते । वे कर्म करता ऐसे कहते । तथा मानते ऐसे ॥ ३७ ॥ या घाससे बिजूखा बनाते । किसान खेती पर रखते । उसे सस्य-रक्षक जानते । पंछी सियार ॥ ३८ ॥ पागल पहना हुवा या नंगा । जैसे दूसरा ही कोई देखेगा । युद्धमें वीरके घाव गिनेगा । दूसरा कोई ॥ ३९ ॥ अथवा महासतीके भोग । देखता रहता सदा जग । किंतु आगमें जलना अंग । न देखता कोई ॥ ४० ॥ अजी ! स्वस्वरूपमें जो जागृत । दृश्य सह द्रष्टा हुवा है अस्त । वह जाने क्या इंद्रियोंकी बात । क्या करते वह ॥ ४१ ॥ बडे कल्लोलमें जब छोटा कल्लोल । समेटते तब किनारेके सकल । मनमें मानते यदि गया निगल । बडा छोटेको ॥ ४२ ॥ किंतु पानीकी दृष्टिसे देख वहां । कौन निगलेगा किसको औ' कहां । वैसे पूर्णको अन्य नहीं है जहां । वह मारेगा ॥ ४३ ॥ जैसे सुवर्णकी ही दुर्गा । तथा सुवर्णका ही खड्ग । उससे जो है नाश होगा । सुवर्ण महिष ॥ ४४ ॥ पूजारीकी दृष्टिसे व्यवहार । यह सब सही है धनुर्धर । किंतु खड्ग दुर्गा महिषासुर । तीनो हैं सुवर्ण ॥ ४५ ॥ जैसे चित्रका पानी हुताश । दृष्टि मात्रका यह आभास । चित्रमें आग या आर्द्र अंश । नहीं दोनों ही ॥ ४६ ॥ ७४९ सर्वगीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग