भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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उसका देहाहंकारका भाव । बोधमें विलय हुवा पांडव । फिर भी जो शरीरका स्वभाव । होते हैं कर्म ॥ २२ ॥ चलकर रुकता यदि चंड मारुत । फिर भी वृक्षोंमें रहता कंप भारत । तथा संदूकमें होता कर्पूर समाप्त । किंतु रहती सुगंध ॥ २३ ॥ हो जाता है संगीतका कार्यक्रम । किंतु चित्तपे रहता परिणाम । बहाव बह जाता है किंतु नम । रहता है भूमिका ॥ २४ ॥ अस्त होने पर भी सूर्यका । रहती है संध्याकी भूमिका । तथा ज्योति दीप्ति सकौतुक । दीखती है ॥ २५ ॥ लक्ष-भेद होने पर । दौडता रहता तीर । जब तक धनुर्धर । रहती शक्ति ॥ २६ ॥ चक्र पर मटका बन जाता । कुम्हार उसको उठा भी लेता । किंतु चक्र जो फिरता रहता । पहली गतिसे ॥ २७ ॥ वैसे ही देहाभिमान मिट जाता । जिस स्वभावसे है देह बनता । वही है देहको चेष्टित करता । अपने आप ॥ २८ ॥ संकल्प बिन जैसे स्वप्न दीखता । बनमें न लगता वृक्ष उगता । अथवा गंधर्व-नगर बनता । बनाये बिना ही ॥ २९ ॥ वैसे आत्माके उद्यम बिन । देहादि जो है पांच कारण । अपने आपही है अर्जुन । करते हैं कर्म ॥ ४३० ॥ विदेहावस्थामें किये गये मुक्त-कर्म- रहते हैं जो प्राचीन संस्कार । पांच कारण हेतु धनुर्धर । कराते कर्म अनेक प्रकार । शरीरादिसे ॥ ३१ ॥ उन कर्ममेंसे फिर । होता है विश्व-संहार । या नव-विश्व सुंदर । होता सृजन ॥ ३२ ॥ किंतु कुमुद जैसे सूखता । या कमल कैसे विकसता । यह दोनों रवि न देखता । उसी प्रकार ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४८