ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे है सच्चे रूप पर । लगाके विस्मयका द्वार । फिर वह स्वप्नका भार । होता निद्रामें ॥ ५४० ॥ वैसे स्व-ज्ञान सीमाके बाहर । असार संसार पंजर पर । तीन अवस्थाओंके धनुर्धर । दिखाता खेल ॥ ४१ ॥ अलंकार रूपमें ढका स्वर्ण । बालक नहीं समझता स्वर्ण । नाम-रूपसे दूर गया मान । अद्वैत जिससे ॥ ४२ ॥ भांडोंके रूपमें आकर । मृत्तिका गयी छिपकर । अथवा दीप बनकर । अग्नि हुवा दुर्बोध ॥ ४३ ॥ अथवा वस्त्रके रूपमें जैसे । मूर्खको तंतु खो जाते वैसे । अथवा चित्रका रूप लेनेसे । खो जाता वस्त्र ॥ ४४ ॥ उसी प्रकार है जो ज्ञान । जानता भूतमात्र भिन्न । तथा ऐसा बोध कल्पना । भूलही गया ॥ ४५ ॥ ईंधनसे भेदा गया अनल । तथा फूलोंसे मानो परिमल । अथवा जलभेदमें सकल । भिन्न हुवा चंद्र ॥ ४६ ॥ तथा वस्तुके नाना प्रकार । देखके छोटे बडे आकार । अनेकत्व देखता अंतर । राजस ज्ञान ॥ ४७ ॥ कहता अब तमका लक्षण । कराता हूं उसकी पहचान । तम जैसे चांडालका स्थान । दिखा रखता ॥ ४८ ॥ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ तामसिक ज्ञानका विवेचन— तब है जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्र हीन । श्रुति पराङ्मुख है नग्न । इसी लिये उसे ॥ ४९ ॥ देहको मान सर्वस्व व्यर्थ ही उलझा रहा । भावार्थ हीन जो क्षुद्र ज्ञान है जान तामस ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५८