भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अन्य शास्त्र जो श्रुत्यागम रत । तामस ज्ञानको मानके निंदित । भगा दिया है पर्वत पर पार्थ । म्लेंछ - धर्मके ॥ ५५० ॥ अजी ! जो ज्ञान है ऐसा । गुण ग्रहण तामस । पागल होकर जैसा । भटकता है ॥ ५१ ॥ नात - गोतकी बाधा न जानता । किसीको निषिद्ध नहीं मानता । मानो खंडहरमें बसा कुत्ता । रहता जैसे ॥ ५२ ॥ उसके मुखमें जो नहीं आता । अथवा खानेसे मुख जलता । ऐसे वस्तुमात्र वह तजता । खाता है सब और ॥ ५३ ॥ सोना चुराते हुए चूहा । भला बुरा न कहता पांडव । न कहता मांसाहारमें जीव । काला या गोरा ॥ ५४ ॥ या जलती जब आग वनमें । भला बुरा न सोचती मनमें । न सोचे माखी जैसे बैठनेमें । मरा या जिया है ॥ ५५ ॥ परोसा हुवा है या वमन । अथवा ताजा या बासी अन्न । जैसे यह भी कागका मन । नहीं जानता वैसे ॥ ५६ ॥ निषिद्धको है तजना । विधिको सदा पालना । इस विषयका ज्ञान । न रहता उसे ॥ ५७ ॥ आंखोंके सामने जो जो आता । वह भोग्य हेतु ही मानता । जो कुछ भी द्रव्य है मिलता । देता शिश्न देवको ॥ ५८ ॥ न तीर्थातीर्थका कुछ ज्ञान । पानीकी न कोई पहचान । प्यासका मुख इसके बिन । न जानता कुछ ॥ ५९ ॥ वैसे ही वह खाद्याखाद्य । न जानता निंद्य - अनिंद्य । जीभको भाता वही योग्य । वह मानता है ॥ ५६० ॥ मानता स्त्री-जात सकल । भोग्य वस्तु ही है केवल । इस विषयमें केवल । यही बोध ॥ ६१ ॥ स्वार्थमें जो जब काम आता । वही उसका आप बनता । अन्य संबंध नहीं जानता । वह कभी कोई ॥ ६२ ॥ सभी होता है मृत्युका अन्न । तथा होता आगका ईंधन । वैसे ही होता विश्वका धन । तामस ज्ञानीको ॥ ६३ ॥ ७५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग