भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे ही विश्व सकल । विषय जाना केवल । इसका एक ही फल । देह-पूजन ॥ ६४ ॥ आकाशसे गिरा हुआ नीर । समुद्रही उसका आधार । वैसे है सभी काज उदर- । पूर्तिके लिये ॥ ६५ ॥ इसे छोड स्वर्ग नर्ककी बात । तथा क्या विहित या अविहित । इस विषयमें है काली रात । जिसको सदैव ॥ ६६ ॥ जिसे देह-खंडका नाम आत्मा । ईश्वर है पाषाणकी प्रतिमा । न उसे इसके परेकी प्रमा । छूती भी कभी ॥ ६७ ॥ इसलिये जब शरीर गिरता । कर्म सह आत्मा भी है मिटता । तब भोगनेके लिये रहता । किस रूपसे कौन ॥ ६८ ॥ यदि कोई ईश्वर है कहता । वह कर्मका फल भी है देता । तब वह ईश्वरको खा जाता । बेच करके ॥ ६९ ॥ गावोंके जो ये देवालयेश्वर । सच्चे नियामक तो धनुर्धर । तब देशके ये बडे डोंगर । चुप क्यों रहते हैं ॥ ५७० ॥ यदि वह ईश्वरको मानता । इस भांति पाषाण ही मानता । आत्माको वह केवल जानता । शरीर मात्र ॥ ७१ ॥ अन्य जो पाप-पुण्यादिक । मानता भ्रम-मात्र एक । मिले सो भोगनेमें सुख । मानता अम्रिसा ॥ ७२ ॥ चर्म-चक्षु जो कुछ दिखाता । इंद्रियां दिखाती मधुरता । उसीको सब कुछ मानता । सत्य अनुभव ॥ ७३ ॥ अथवा जहां ऐसी प्रथा । बढती देखता तू पार्था । बढ़ती गगनमें वृथा । धूम-लता जैसे ॥ ७४ ॥ गीला अथवा सूखा हुआ । व्यर्थ ही जाता है पांडवा । बढ़कर टूटता हुआ । गजदंड जैसा ॥ ७५ ॥ जैसे ईखका बुट्टा होता । या जैसे हिजड़ा रहता । या जैसे वन है लगता । सेमलका जो ॥ ७६ ॥ अथवा बालकका मन । या चोरके घरका धन । अथवा जैसे गल-स्तन । बकरेके जैसे ॥ ७७ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६०

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