ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनित्य-कर्म जो है भला भला । नैमित्तिकका जोड़ भी मिला । मानो सोनेसे सुहाग मिला । ऐसी है शोभा ॥ ८८ ॥ तन मनका सार सर्वस । दे कर बढाती स-संतोष । माता बालकको पाल पोस । बिन उकताये ॥ ८९ ॥ जीव भावसे ऐसे कर्मानुष्ठान । कर भी न जाते फलपे नयन । करता है उस कर्मका अर्पण । केवल ब्रह्ममें ॥ ५९० ॥ प्रियाराधनमें जैसे सहज भाव । नहीं रहता कम अधिकका भाव । ऐसे सत्प्रसंगमें रहता पांडव । नित्य-कर्म ॥ ९१ ॥ तब न होता अकारण खेद । उद्वेगसे जीवको न दें बांध । अथवा होनेसे मान आनंद । उछलता कभी ॥ ९२ ॥ ऐसे कुशलता पूर्वक । किया जाता है कर्म नेक । कहते हैं उसे सात्विक । कर्म पांडव ॥ ९३ ॥ इस पर राजसका सुन । कहता हूं मैं सही लक्षण । अपना चित्त देके अर्जुन । सुन तू यह ॥ ९४ ॥ यत् तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥ राजस कर्मका लक्षण— धनमें जैसे कोई माता पितासे । न बोलता व्यवहारमें ठीकसे । किंतु चलता विश्वमें आदरसे । महामूर्ख ॥ ९५ ॥ या जड़में न दें तुलसीके । दूरसे देता बूंद पानीके । किंतु सींचता नित द्राक्षके । मूलमें दूध ॥ ९६ ॥ वैसे हैं जो नित्य नैमित्तिक । कर्म करना जो आवश्यक । उसके विषयमें जो देख । उठता भी नहीं ॥ ९७ ॥ सकाम और सायास साहंकारेण वा पुनः । किया जाता वही सारा कहाता कर्म राजस । २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६२