भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अब कार्यक्रममें तन मन । दानादि देकर भी संपूर्ण । न जानता है कुछ भी अर्जुन । दिया अधिक ॥ ९८ ॥ ड्योढे सूदमें जब लगाता । तब देनेमें तृम न होता । या खेतमें जब बीज बोता । न कहता रुको अब ॥ ९९ ॥ पारस हाथमें आता अर्जुन । तब जैसे लोह लेनेमें धन । खर्च करनमें सोत्साह मन । उछलता जैसे ॥ ६०० ॥ वैसे फल देखकर सम्मुख । कर्म करता उत्साह पूर्वक । करता सो कम मान अधिक- । अधिक करता जाता ॥ १ ॥ ऐसे फल कामुकसे । होते हैं यथाविधिसे । काम्य-कर्म अधिकसे । होते अधिक ॥ २ ॥ तथा उस काम्य-कर्मका । पीटता ढिंढोरा सदाका । नाम-पाठसे है कर्मका । करता भोज्य ॥ ३ ॥ इससे बढ़ता कर्माहंकार । न जानता पिता या गुरु फिर । जैसे नहीं मानता काल-ज्वर । कोई औषध ॥ ४ ॥ ऐसे है स-अहंकार । फलाभिलाषासे नर । करता है स-आदर । जो जो कुछ ॥ ५ ॥ तथा इस करनेमें भी जैसा । मदारीका व्यवसाय हो ऐसा । करता है जो अतीव संयास । जीविकाही जान ॥ ६ ॥ एक दानेके लिये उंदुर । खोदता जाता सभी डोंगर । या सेवारके लिये दर्दुर । मथता समुद्र ॥ ७ ॥ भीखके परे कुछ न मिलता । फिर भी सपेरा साप ढोता । किसीको कष्ट भी अच्छा लगता । इसको करें क्या ॥ ८ ॥ देखके परमाणुका भी लाभ । दीमक खोदती पृथ्वीका गर्भ । वैसे धर स्वर्ग-सुखका लोभ । करते कष्ट ॥ ९ ॥ यह काम्य-कर्म सक्लेस । जानना है यहां राजस । कहता लक्षण तामस । सुन तू अब ॥ ६१० ॥ ७६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग