भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तथा आप कमाया हुवा धन । व्यय न करता कवडी जान । उस पर करता क्षण क्षण । निछावर जीव ॥ ५३ ॥ सावध रहता जैसा कृपण । बक रखता मीनपे नयन । वैसे देख वह पराया धन । रहता दक्ष ॥ ५४ ॥ पास जानेसे जो उलझाता । लगनेसे देह ही फाडता । फल मानो जीभको जलाता । खट्टा बेर ॥ ५५ ॥ वैसे वह जो काया वाचा मन । दुखाता रहता सबका मन । करनेमें वह स्वार्थ-साधन । न देखता परहित ॥ ५६ ॥ वैसे ही करनेमें जो कर्म । होता है यदि वह अक्षम । किंतु नहीं होता मनोधर्म । अरोचक उसका ॥ ५७ ॥ कनक फल सबाह्य जैसे । भरा रहता विष कांटोंसे । रहता वह दुर्बल वैसे । सदा शुचित्वमें ॥ ५८ ॥ जब वह कर्म फल पाता । फूलकर कुप्पा बन जाता । विश्वको अंगूठा भी दिखाता । चिढाकरके ॥ ५९ ॥ या कर्म होता जब निष्फल । शोकमें डूब जाता पाताल । तथा धिक्कारता है सकल । कर्म जात ॥ ६६० ॥ देख ऐसा कर्माचरण । जान तू काया वाचा मन । कर्ता है राजस अर्जुन । निःसंशय वह ॥ ६१ ॥ अब कहता धनुर्धर । जो है कुकर्मका आगर । होता है जो ऐसा गोचर । कर्ता तामस ॥ ६२ ॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥ स्वच्छंदी क्षुद्र गर्विष्ठ घातकी शठ आलसी । दीर्घ-सूत्री सदा खिन्न कर्ता तामस है कहा ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६८