भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तामस कर्ताके लक्षण— लगने पर मैं जैसे । आगेका जलता कैसे । यह न जानता वैसे । अग्निस्र्फुलिंग ॥ ६३ ॥ होता मैं कैसे वधका कारण । यह न जानता शस्त्र अर्जुन । कालकूटको नहीं होता ज्ञान । अपने परिणामका ॥ ६४ ॥ ऐसे वह धातुक क्रिया । करता रहता धनंजय । उससे अपना पराया । होता घात ॥ ६५ ॥ उसको जब जो कुछ करना । क्या होता है यह नहीं देखना । जिसभांति बवंडरका आना । ऐसी क्रिया उसकी ॥ ६६ ॥ उसका और जिस कार्यका । संबंध नहीं होता किसीका । पागलसे है जैसे कर्मका । नहीं होता वैसे ॥ ६७ ॥ बैलोंके गलेमें जैसे किल्हर । इंद्रियोंमें विषय है धनुर्धर । लगते हैं तब उन्हें भोगकर । बिताता जीवन ॥ ६८ ॥ हंसने या रोनेका काल । नहीं जानता जैसे बाल । वैसे ही सदा उच्छृंखल । रहता है वह ॥ ६९ ॥ होनेसे सदा प्रकृतिके आधीन । कृत्याकृत्य स्वादसे होता उलझन । अपने कृत्योंसे फूलता अर्जुन । कूडेके घरसा ॥ ६७० ॥ तथा कभी किसीको देनेमें मान । ईश्वरको भी न करता नमन । स्तब्धतामें पर्वतको भी अर्जुन । हराता वह ॥ ७१ ॥ अति कुटिल उसका मन । छुपाये हुए सभी वर्तन । पण्यांगना सम जो नयन । छल-मदसे भरे ॥ ७२ ॥ अथवा मानो कपटका । बनाया ही तन उसका । जीना मानो द्यूत-कर्मका । घर ही रहता है ॥ ७३ ॥ यह जो उसका प्रादुर्भाव । साभिलाष भिल्लका है गांव । उस राह पे कभी पांडव । जाना भी नहीं ॥ ७४ ॥ ७६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग (88)