ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरोंका सुख देख कर । मानता कष्ट अपने पर । जैसे लवण दूधमें गिर । करता अपेय ॥ ७५ ॥ अथवा जैसे ठंडे पदार्थ । आगमें पड़ कर पार्थ : भड़कते मानो वही मूर्त । अग्नि ही है ॥ ७६ ॥ जैसे अच्छा भला आहार । पहुंच पेटके अंदर । बनता मल धनुर्धर । उसी भांति ॥ ७७ ॥ बना है कभी किसीका कुशल । देखके वह जानता है शूल । तथा उस बताके प्रतिकूल । आता बाहर ॥ ७८ ॥ गुण लेकर जो देता दोष । अमृतका करता है विष । दूध पिलाता उसको विष । देता जैसे सर्प ॥ ७९ ॥ सुख मिलेगा इस लोकमें । गति मिलेगी परलोकमें । कर्म आता ऐसे समयमें । ऐसे समय ॥ ६८० ॥ आती है उसको अपने आप । निद्रा रखी है जैसे सुखरूप । दुर्व्यवहारमें अपने आप । भागती है वह ॥ ८१ ॥ जैसे द्राक्षारस या आम्र-रस । खानेमें मुख चुराता वायस । तथा अंधा बनाता है दिवस । जैसे उलूकको ॥ ८२ ॥ वैसे कल्याण-काल जब देखता । तब उसको है आलस आता । प्रमादमें है स्फुरण चढ़ता । चाहता वैसे ॥ ८३ ॥ जैसे सदैव समुद्रका उदर । वडवाग्नि रखता है भरकर । वैसे है वह विषाद निरंतर । रखता अपनेमें ॥ ८४ ॥ लेंड़ककी आगमें धूमावधि । या अपानमें होती है दुर्गंधि । इसी भांति वह जीवनावधि । विषाद करता ॥ ८५ ॥ वैसे कल्पांतके भी पार । फल प्राप्ति हो धनुर्धर । ऐसे रखता है व्यापार- । अभिलाषा ॥ ८६ ॥ विश्वके उस पारकी चिंता । चितमें ही करता रहता । किंतु हाथमें नहीं लगता । तृण भी उसके ॥ ८७ ॥ ऐसे वह लोगोंमें पार्थ । पाप-पुंज ही होता मूर्त । देखना ऐसे अन्याहत । कर्त्ता तामस ॥ ८८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७०