ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा कर्म कर्त्ता ज्ञान । इनके हैं चिन्ह तीन । दिखाये तुझे सुजन- । चक्रवर्ती ॥ ८९ ॥ बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥ बुद्धिके तीन प्रकार— जब अविद्याके ग्राममें । बढ़कर मोह बस्तिमें । तथा संदेह भूषणमें । सजके जो आती ॥ ९० ॥ आत्म-निश्चयके जो दर्शन । करनेमें सुंदर दर्पण । ऐसी बुद्धिका भी तुझे तीन । कहता प्रकार ॥ ९१ ॥ इन सत्त्वादि गुणोंने तीन । न किये इस विश्वमें कौन । विषयके प्रकार अर्जुन । कह तू मुझे ॥ ९२ ॥ बिना अग्निके कोई काष्ठ । हुवा है क्या विश्वमें सृष्ट । वैसे दृश्य-कोटिमें स्पष्ट । नहीं है जो त्रिधा ॥ ९३ ॥ इसीलिये ये तीनों गुण । करते बुद्धिको त्रिगुण । वैसे धृतिको भी अर्जुन । त्रिधा किया है ॥ ९४ ॥ एक जो ऐसे दुष्ट तीन । लेकर भिन्न भिन्न लक्षण । इनको कहेंगे स-लक्षण । यहीं अब ॥ ९५ ॥ बुद्धि और धृतिके जहां । भाग दो किये गये यहां । प्रथम बुद्धिके ही यहां । कहूँगा प्रकार ॥ ९६ ॥ उत्तम मध्यम निकृष्ट । संसारमें आता जो सुभट । उस प्राणीकी तीन बाट । होती है यहां ॥ ९७ ॥ अकरण काम्य जो निषिद्ध । उसके मार्ग हैं ये प्रसिद्ध । ये हैं जो संसारमें सबाध । जीवोंको यहां ॥ ९८ ॥ बुद्धिके भेद ये तीन वैसे ही धृतिके कहे । गुणानुसार जो सारे कहता भिन्न भिन्न मैं ॥ २९ ॥ ७७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग