ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
ऐसा कर्म कर्त्ता ज्ञान । इनके हैं चिन्ह तीन । दिखाये तुझे सुजन- । चक्रवर्ती ॥ ८९ ॥ बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥ बुद्धिके तीन प्रकार— जब अविद्याके ग्राममें । बढ़कर मोह बस्तिमें । तथा संदेह भूषणमें । सजके जो आती ॥ ९० ॥ आत्म-निश्चयके जो दर्शन । करनेमें सुंदर दर्पण । ऐसी बुद्धिका भी तुझे तीन । कहता प्रकार ॥ ९१ ॥ इन सत्त्वादि गुणोंने तीन । न किये इस विश्वमें कौन । विषयके प्रकार अर्जुन । कह तू मुझे ॥ ९२ ॥ बिना अग्निके कोई काष्ठ । हुवा है क्या विश्वमें सृष्ट । वैसे दृश्य-कोटिमें स्पष्ट । नहीं है जो त्रिधा ॥ ९३ ॥ इसीलिये ये तीनों गुण । करते बुद्धिको त्रिगुण । वैसे धृतिको भी अर्जुन । त्रिधा किया है ॥ ९४ ॥ एक जो ऐसे दुष्ट तीन । लेकर भिन्न भिन्न लक्षण । इनको कहेंगे स-लक्षण । यहीं अब ॥ ९५ ॥ बुद्धि और धृतिके जहां । भाग दो किये गये यहां । प्रथम बुद्धिके ही यहां । कहूँगा प्रकार ॥ ९६ ॥ उत्तम मध्यम निकृष्ट । संसारमें आता जो सुभट । उस प्राणीकी तीन बाट । होती है यहां ॥ ९७ ॥ अकरण काम्य जो निषिद्ध । उसके मार्ग हैं ये प्रसिद्ध । ये हैं जो संसारमें सबाध । जीवोंको यहां ॥ ९८ ॥ बुद्धिके भेद ये तीन वैसे ही धृतिके कहे । गुणानुसार जो सारे कहता भिन्न भिन्न मैं ॥ २९ ॥ ७७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥ सात्त्विक बुद्धिके लक्षण- तभी अधिकारसे मान लिया । तथा विधि प्रवाहसे जो आया । वह एक ही भला कहलाया । नित्यकर्म ॥ ९९ ॥ वही आत्म-प्राप्ति फल । दृष्टि रखके केवल । प्यासमें जैसा है जल । सेवन योग्य ॥ ७०० ॥ इतनेसे ही वह जो कर्म । छुडाता जन्म-भय विषम । तथा कर देता है सुगम । मोक्ष-सिद्धि ॥ १ ॥ ऐसे कर्मको है करता । संसार भयसे छूटता । करणीयत्वमें बढता । मुमुक्ष पदमें ॥ २ ॥ वहां जो बुद्धि ऐसा । बंधाती है भरोसा । मोक्ष रखा हुवासा । मिलेगा ही ॥ ३ ॥ इसीलिये रची जैसे निवृत्ति । तलमें आधार डाल प्रवृत्ति । इस कर्ममें डुबकी लगाती । इतनेमें ही ॥ ४ ॥ तृषार्थ जैसे पानीसे जीता । पूरमें नांव है तरता । या अंधार कूपसे छूटता । सूर्य प्रकाशसे ॥ ५ ॥ नाना पथ्यसे औषध लेता । ऐसे रोग-ग्रस्त भी बचता । या मछलीको पानी मिलता । तब जैसे वह ॥ ६ ॥ निश्चय-पूर्वक बचता । उसमें न होता अन्यथा । वैसे कर्म-प्रवृत्त होता । मिलता मोक्ष ॥ ७ ॥ कर्म रहता जो करणीय । वहां पूर्ण ज्ञान धनंजय । तथा रहता अकरणीय । कहा है आगे ॥ ८ ॥ क्या कर्तव्य अकर्तव्य बंध मोक्ष भयाभय । धरना तजना जाने वह है बुद्धि सात्त्विक ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ७७२
वह जो कर्म काम्यादिक । है संसार भय-दायक । अकरणीय है तू देख । कहा गया है ॥ ९ ॥ उस अकार्य कर्ममें । जन्म मरण कालमें । प्रवृत्ति सदा पीछेमें । भागती है ॥ ७१० ॥ जैसे आगमें नहीं घुसता । अथाह पानीमें न कूदता । प्रज्वलित शूल न धरता । उसी प्रकार ॥ ११ ॥ या काला नाग जो फूत्करता । उसे देख पकड़ा न जाता । व्याघ्र गुहामें घुसा न जाता । उसी प्रकार ॥ १२ ॥ वैसे कर्म अकरणीय । देखके होता महाभय । उपजाती जो असंशय । बुद्धि सात्विक ॥ १३ ॥ जैसे विष मिश्रित अन्न । देख होता मृत्युका ज्ञान । निषिद्ध कर्ममें भान । होता कर्मका वैसे ॥ १४ ॥ फिर जो बंध भय भरित । होता है निषिद्ध कर्म प्राप्त । निर्विकार जानता निवृत्त । होनेका वह ॥ १५ ॥ ऐसे ही कार्याकार्य विवेक । या प्रवृत्ति-निवृत्तिमापक । जैसे रत्न-पारखी परख । करता जौहरी ॥ १६ ॥ वैसे कार्याकार्य शुद्धि । जानती जो निरवधि । कहाती सात्त्विक बुद्धि । यह तू जान ॥ १७ ॥ यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥ राजसिक बुद्धिका लक्षण— बगुलोके गांवमें जैसे । चलता नीरक्षीर वैसे । या अंधा न जानता जैसे । दिवस रात्र ॥ १८ ॥ कार्य अकार्य कैसे क्या क्या है धर्म अधर्म जो । न जान सकती स्वच्छ जान तू बुद्धि राजस ॥ ३१ ॥ ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
या जिसे फूलोंका मकरंद भाता । अथवा काठ कुरेदना सुहाता । न होती दोनोंमें कोई विसंगतता । भ्रमरके लिये ॥ १९ ॥ वैसे यहां कार्याकार्य । धर्माधर्मका विषय । न होते कोई निर्णय । आचरणसे ॥ ७२० ॥ अजी ! आंखके बिन लेते मोती । उसमें फंसनेकी सदा भीती । कभी सफलता भी मिलती । आश्चर्यसे ही ॥ २१ ॥ वैसे जो अकरणीय होता । सम्मुख आनेसे रह जाता । तभी तो करनेसे छूटता । नहीं तो दोनों एक ॥ २२ ॥ बुद्धि वह उचित अनुचित । नहीं जानती कुछ भी पार्थ । विवाहमें जिस भांति अक्षत । डालते हैं लोग ॥ २३ ॥ अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥ तामसिक बुद्धिके लक्षण— होता जो राजाका राज पथ । चोरोंको होता है विपरीत । उदय होते ही माने रात । राक्षस जैसे ॥ २४ ॥ पुरुष होता है जो भाग्यहीन । उसे कोयला होता गढा धन । ऐसे होकर भी न होता धन । उस जीवको ॥ २५ ॥ वैसे धर्ममात्र जो है केवल । उसकी बुद्धि जो है पाप मल । सत्यको मानती असत्य मूल । तामस बुद्धि ॥ २६ ॥ मानते सब जिसे अर्थ । उसको संपूर्ण अनर्थ । जो जो गुण है व्यवस्थित । उसे मानता दोष ॥ २७ ॥ अथवा मानो श्रुति जात । अनुकरण करते पार्थ । वह सबही विपरीत । मानती वह ॥ २८ ॥
तमसे भरके जो है धर्म माने अधर्मको देखती उल्टा अर्थ वह है बुद्धि तामसी ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७४
इसे किसीसे न पूछकर । तामस मानना धनुर्धर । जिस बुद्धिको धर्मार्थ वैर । क्या करना वह ॥ २९ ॥ ऐसे ये बुद्धिके भेद । किये तुझसे विशद । स्वबोध कुमुद चंद्र । कहे तुझसे ॥ ७३० ॥ अब इसकी जो बुद्धि वृत्ति । सभी कर्मको आधार होती । कैसी वह त्रिविध धृति । कहता हूं तुझे ॥ ३१ ॥ उस धृतिके जो विभाग । तीन होते हैं यदा लिंग । कहता हूं उसे सुभग । सुन तू अब ॥ ३२ ॥ धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥ सात्त्विक धृतिके लक्षण— उदय होते ही दिनकर । मिटता चौर्य सह अंधार । अथवा राजाज्ञा अव्यापार । रोकती जैसे ॥ ३३ ॥ अथवा पवनका जो वेग । चलता रहता है सवेग । मिटते गर्जन सह मेघ । अपने आप ॥ ३४ ॥ या अगस्तके होते दर्शन । सिंधु धारण करता मौन । चंद्रोदयमें कमल-वन । सिमिटते हैं ॥ ३५ ॥ जैसे मदोन्मत्त कुंजर । चलनेमें उठाके पैर । न रखता है भूमिपर । देखके सिंह ॥ ३६ ॥ ऐसे होते हैं जो धीर । उपजते ही अंतर । मनादिकके व्यापार । तजते वहीं ॥ ३७ ॥ इंद्रिय विषयक जो गांठ । आप ही छूटती है सुभट । घुसते मन-मायके पेट- । में दसो जन ॥ ३८ ॥ चलाती जो क्रिया सारी मन इन्द्रिय प्राणकी । समता स्थिरतासे जो वह है धृति सात्त्विक ॥ ३३ ॥ ७७५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अधोर्ध्वकी मर्यादा तोड़कर । प्राण नवोंकी गांठ बांधकर । बैठा रहता है डूब कर । सुषुम्नामें ॥ ३९ ॥ संकल्प विकल्प पट । खोल होता मन प्रकट । बुद्धिके पीछे जा सुभट । बैठता वह ॥ ४० ॥ इस धृतिके कारण । मन प्राण और करण । स्वचेष्टाका संभाषण । छोड देते हैं ॥ ४१ ॥ मन प्राणादि फिर संपूर्ण । ध्यानके अंतर्गृहमें जान । बंद कर रखता अर्जुन । योगसे वह ॥ ४२ ॥ फिर जो परमात्मचक्रवर्ती । स्वाधीन होनेकी होती निश्चिती । तब तक छूट न होके धृती । बांध रखती उन्हे ॥ ४३ ॥ यहां जो वही धृती । सात्विक कहलाती । ऐसे जो लक्ष्मी-पति । कहता पार्थसे ॥ ४४ ॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसंगेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ राजसी धृतिके लक्षण— शरीर ही आप मान कर । स्वर्ग संसारके दोनों घर । भोगना चाहता पेट भर । त्रिवर्गोपायसे ॥ ४५ ॥ मनोरथके समुद्र पर । धर्मार्थकामके नांव पर । धैर्य-बलसे क्रिया व्यापार । करता है जो ॥ ४६ ॥ कर्मकी पूंजी जो डालना । उसका चौगुना चाहना । इतना सायास करना । जिसका धैर्य ॥ ४७ ॥ वह धृति है राजस । सुन तू पार्थ विशेष । तीसरी है जो तामस । कहता हूं अब ॥ ४८ ॥ धर्मार्थ काम सारे ही चलाती लाभ देखके । डुबाती फल-आशामें वह है धृति राजसी ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७६
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
तामसी धृतिके लक्षण— सभी अधम गुणोंसे । आ जाता है रूप जिसे । कोयला जो कालिमासे । बनता है ॥ ४९ ॥ अजी ! प्राकृत तथा हीन । उसको भी गुणका मान । नाम होता है पुण्यजन । दैत्यका जैसे ॥ ७५० ॥ नवग्रहमें जो है पिंगल । उसको कहते हैं मंगल । वैसे तममें गुण केवल । अविचार मात्र ॥ ५१ ॥ सब दोषोंका आश्रय स्थान । तमसे सान कर अर्जुन । अंगांग जिस नरका मान । बनाये गये हैं ॥ ५२ ॥ आलसको पकड़ बैठता । निद्राका मानो घर ही बनता । पापसे जो सगा ही रहता । छूटे दुःखसे कैसे ॥ ५३ ॥ तन धनके मोहसे अर्जुन । नहीं छूटता भयका कारण । पत्थर न छोड़ता कडापन । उसी प्रकार ॥ ५४ ॥ पदार्थ जातमें आस रखता । इससे शोकका घर बनता । पापसे कभी छूट न सकता । कृतघ्न जैसे ॥ ५५ ॥ जीव-भावसे असंतोष । धरके रखा अहर्निश । इससे मैत्री है विशेष । विषादसे नित ॥ ५६ ॥ ल्हसुन छोडती नहीं दुर्गंधी । तथा कुपथ्यको न छोडती व्याधी । इसी भांति इसको मरणावधी । विषाद् न छूटता ॥ ५७ ॥ तथा तारुण्य वित्त काम । इससे बढ़ता संभ्रम । तमी है भयका आश्रम । बनता वह ॥ ५८ ॥
निद्रा भय न जो छोडे शोक खेद तथा मद । ओढती बुद्धिपे तंद्रा वह है धृति तामस ॥ ३५ ॥
७७७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आगको न छोड़ता ताप । तथा वैरको नहीं सांप । विश्वका वैरी है वासिप । अखंडित ॥ ५९ ॥ अथवा शरीरको काल । न भूलता कभी निर्मल । वैसे ही तममें अचल । रहता मद ॥ ७६० ॥ ऐसे ये पांच निद्रादिक । तामसके रहते दोष । इसका आधार जो एक । धृति तामस ॥ ६१ ॥ कर्म बुद्धि तथा धृतिका संबंध— कहलाती है ऐसी धृति । जानना तामस सुमति । ऐसा कहता विश्व-पति । धनुर्धरसे ॥ ६२ ॥ इस प्रकार त्रिविध बुद्धि । करती कर्म निश्चय आदि । धृति बनाती उसकी सिद्धि । तदनंतर ॥ ६३ ॥ सूर्यादिसे दीखता पथ । चलना होता पैरोंको नित । किंतु चलना धैर्यसे पार्थ । होता निरंतर ॥ ६४ ॥ वैसे बुद्धि कर्मको दिखाती । इंद्रियां उसको हैं करतीं । करनेमें जो अपेक्षा होती । धैर्यकी सदा ॥ ६५ ॥ तब यह सब तेरे प्रति । कहा है मैंने त्रिविध धृति । इससे होती कर्म निष्पत्ति । होने पर तब ॥ ६६ ॥ त्रिविध कर्मके फल उत्पन्न । होने पर उसे सुख कहते जान । वह भी त्रिविध होता अर्जुन । कर्म परसे ॥ ६७ ॥ फल रूप यह सुख । त्रिगुणसे भिदा देख । मीमांसा इसकी नेक । करूंगा शुद्ध ॥ ६८ ॥ किंतु शुद्ध है वह कैसे कहूंगा । कानोंसे ग्रहण करना चाहेगा । कान तथा हाथका मल लगेगा । इस शुद्धताको ॥ ६९ ॥ इससे करके तू अनादर । श्रवण होता है जो बाहर । सुन अंतःकरण देकर । जीवभावसे ॥ ७७० ॥ ज्ञानेश्वरी ७७८
ऐसे कह करके देव । त्रिविध सुखका प्रस्ताव । निरूपते हैं सावयव । इस प्रकारके ॥ ७१ ॥ सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखांतं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ तीन प्रकारके सुखका विवेचन— कहूंगा सुखत्रय संज्ञा । ऐसी की है मैंने प्रतिज्ञा । कहता हूं सुन तू प्राज्ञ । इस समय ॥ ७२ ॥ जीव करता जब आत्मालिंगन । तब अनुभव करता अर्जुन । उस प्रकारका कराता मैं दर्शन । तुझको अब ॥ ७३ ॥ किंतु मात्राके नापसे जैसे । दिव्यौषधियां लेते हैं वैसे । या रांगेको रस भावनासे । बनाते हैं चांदी ॥ ७४ ॥ अथवा जैसे नूनका नीर । करना हो तो दो चार बार । देने पड़ते उसको मार । पानीके जैसे ॥ ७५ ॥ वैसे प्राप्त सुख लेशसे । जीवको भावना देनेसे । नासता है भावाभ्याससे । जीवका दुःख ॥ ७६ ॥ ऐसा जो आत्म-सुख । हुआ यहां त्रिगुणात्मक । वह भी कहता हूं देख । उसका रूप ॥ ७७ ॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥ सात्विक सुखका लक्षण— जैसे चंदनकी जड़ । सर्पसे रहता अड़ । या निधानका किवाड । पिशाचके हाथमें ॥ ७८ ॥ कहता सुन तू पार्थ सुख तीन प्रकारके । अभ्याससे रमाता जो दिखाता अंत दुःखका ॥ ३६ ॥ आदि जो विषसा तीता अंतमें अमृतोपम । आत्मामें शुद्ध बुद्धीको मिलता सुख सात्विक ॥ ३७ ॥ ७७९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
या स्वर्गके सुंदर भोग । रोक रखते हैं जो याग । अथवा दुःखके प्रसंग । बालत्वमें जैसे ॥ ७९ ॥ होनेमें जैसे दीपकी सिद्धि । कठिनाई घूमकी है आदि । अथवा होती है दिव्योोषधि । जीभको दुःखद ॥ ७८० ॥ इस प्रकार सुन अर्जुन । जिस सुखका उगम-स्थान । यम दम आदिके कारण । होता है विषम ॥ ८१ ॥ करना सभी स्नेहका दमन । वैराग्य उत्पन्न होता अर्जुन । स्वर्ग संसार सीमाका बंधन । रहता है दूर ॥ ८२ ॥ विवेक श्रवणका अति त्रास । तथा व्रताचरण है कर्कश । करते हैं बुद्धि आदिका नाश । रात्रिदिवस ॥ ८३ ॥ मुखसे सुषुम्नाके । ढेर प्राणायामके । पडते हैं ढेर ढेरके । निगलना तब ॥ ८४ ॥ जैसे चक्रवाकके विरहमें होता । या शिशुको स्तनसे छुडानेमें होता । भूखेको थालीसे उठानेमें जो होता । उससे अधिक दुःख ॥ ८५ ॥ माताके सामनेसे बालक । छीनता है काल जब एक । अथवा छूटता है उदक । मीनसे जब ॥ ८६ ॥ वैसे विषयोंका घर है पार्थ । तजनेमें इंद्रियोंको युगांत । होता तब धीर सहता नित । वैराग्यशाली ॥ ८७ ॥ ऐसे जिस सुखका प्रारंभ । दिखाता है काठिण्यका क्षोभ । फिर होता क्षीराब्धिमें लाभ । अमृतसा अंतमें ॥ ८८ ॥ प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य शंभुने गला । तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ८९ ॥ चुभता अगसे भी तीखा । कच्चापन हरे द्राक्षका । पक्तामें जैसे उसका । माधुर्य रहता ॥ ७९० ॥ इस वैराग्यादिका भी वैसा । सुपक्व आत्म-प्रकाशमें वैसा । वैराग्य सह होता हे नाशसा । अविद्याजातका ॥ ९१ ॥ तब जैसे गंगा सागरमें । बुद्धि विलीन होती आत्मामें । अद्वयानंदकी अपनेमें । खुलती खान ॥ ९२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८०
ऐसे स्वानुभव विश्राम। वैराग्य-मूलका परिणाम । उस सुखको सात्विक नाम । दिया गया है ॥ ९३ ॥ विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥ राजस सुखके लक्षण- मिलती जब विषय इंद्रियां । छूता है जो सुख उस समय । दोनों किनारोंको हे धनंजय । उफानमें आकर ॥ ९४ ॥ अधिकारी आते जब गांव । होता है जब जैसा उत्सव । अथवा ऋण लेके विवाह । विस्तार होता ॥ ९५ ॥ या रोगीकी जीभमें जैसे । केला-बूरा भाता है वैसे । बचनाग पहले जैसे । लगता मीठा ॥ ९६ ॥ प्रवास-चौर्यके पहले मित्र । या हाट बातका कलत्र । होते उनके विनोद विचित्र । उसी प्रकार ॥ ९७ ॥ वैसे जो विषयेंद्रियोंका मिलन । करता जीवके सुखमें पोषण । फिर जैसे चट्टानको रत्न मान । मरता हंस जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे खर्चके सारा उत्पन्न । मिटता जीवन संपन्न । क्षीण होता सुकृतका धन । जीवका सारा ॥ ९९ ॥ तथा जब सब भोग मिटता । तब वह मात्र स्वप्नसा होता । फिर केवल मात्र जो रहता । हानिका भार ॥ ८०० ॥ विपत्ति है ऐसे जो सुख । ऐहिक परिणाम देख । परमें बनके जो विष । उलटता है ॥ १ ॥ करनेसे लाड़ विषयोंके । जला करके खेत धर्मके । भोग किये नाना उत्सवके । विषयोंसे वहां ॥ २ ॥ पहला लगता मीठा अंतमें विष मारक । विषय योगसे पाती इंद्रियां सुख राजस ॥ ३८ ॥ ७८१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
पातकोंमें तब आता बल । नरकमें देते हैं वे खल । उस सुखने किया है छल । अंतमें ऐसे ॥ ३ ॥ बछनाग विष है मधुर । किंतु अंतमें मारक क्रूर । वैसे पहले होता मधुर । अंतमें कटु ॥ ४ ॥ यह सुख निःसंदेह पार्थ । रजो गुणसे बना है सार्थ । इसीलिये न छूना सुखार्थ । इसका अंग ॥ ५ ॥ यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ तामसिक सुखके लक्षण— करके अपेयका पान । तथा अखाद्यका भोजन । और पर-स्त्री-सन्निधान । देता है जो सुख ॥ ६ ॥ या दूसरोंका कर संहार । और कर परस्वापहार । होता है सुखका अवतार । भाटोंके मुखसे ॥ ७ ॥ आलस्यमें होता जिसका पोषण । या निद्रामें होते हैं अनुभव जान । जिसका आद्यंत भुलाता अर्जुन । अपने पथको ॥ ८ ॥ जो कुछ है वह पार्थ । तामस मान यथार्थ । इसमें सुखकी बात । असंभाव्य ॥ ९ ॥ मूलमें कर्मके तीन प्रकार । इससे सुख भी तीन प्रकार । यह सब तुझे शास्त्रानुसार । कह दिया मैंने ॥ ८१० ॥ कर्ता कर्म तथा कर्म-फल । यह त्रिपुटि एक केवल । इसके बिना न सूक्ष्म-स्थूल । कुछ भी यहां ॥ ११ ॥ तथा यह जो त्रिपुटि । तीनों गुणोंमें किरीटी । बुनी गयी है जो पर्टी । तंतु समान ॥ १२ ॥ निद्रा प्रमाद आलस्य आत्माको घेरके सदा । आदि औ' अंतमें जो है भुलाता सुख तामस ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८२
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥ प्रकृतिके ये गुण सर्वव्यापी और सबको बंधनकारक हैं— तभी जो प्रकृतिसे प्रकट होता । तथा सत्वादिकसे नहीं बंधता । स्वर्ग या मृत्यु लोकमें नहीं होता । ऐसा कुछ भी कहीं ॥ १३ ॥ उनके बिना कहीं कंबल । मृत्तिका बिन कर्दम गोल । अथवा जल बिन कल्लोल । होता है क्या ॥ १४ ॥ वैसे कहीं गुणके बिन । नहीं है सृष्टिकी रचना । ऐसे नहीं हुवा अर्जुन । प्राणिजातमें ॥ १५ ॥ इसीलिये यह सकल । तीन गुणोंसे है केवल । बनाया गया है अखिल । ऐसे जान ॥ १६ ॥ गुणोंसे देवोंके तीन प्रकार । तथा लोकके भी तीन आकार । गुणोंसे समाजको दिये चार । व्यापार वर्णके ॥ १७ ॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥ वर्ण-व्यवस्थाका आधार भी तीन गुण ही है— वही जो चार वर्ण । पूछेगा तू कौन कौन । वहां जो मुख्य ब्राह्मण । आधार ही है ॥ १८ ॥ यहां जो क्षत्रिय वैश्य दोन । मानमें ब्राह्मणोंके समान । योग्य हैं वे वैदिक विधान । करनेमें जो ॥ १९ ॥ शूद्रका है चतुर्थ वर्ण । वेदसे नाता नहीं जान । तभी त्रिवर्णके आधीन । उसकी वृत्ति ॥ ८२० ॥ पृथ्वी पर यहां या तो देवोंमें स्वर्गमें कहीं । प्रकृतिके गुणोंमेंसे कोई भी छूटता नहीं ॥ ४० ॥ ब्राह्मणादिक वर्णोंका किया कर्म विभाजन । गुण है जिसके जैसे उनके अनुसारही ॥ ४१ ॥ ७८३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.
वृत्तिका निकट संबंध । ब्राह्मणादिसे होता सिद्ध । उससे शूद्र जो प्रसिद्ध । हुवा चौथा ॥ २१ ॥ जैसे फूलोंके साथ ही साथ । सूत्रकी गंध लेते श्रीमंत । द्विज संग शूद्रको भी पार्थ । स्वीकारते वेद ॥ २२ ॥ ऐसी है अजी पार्था । चातुर्वर्ण्य व्यवस्था । दिखाऊं कर्म पथ । इसका मैं ॥ २३ ॥ जिन गुणोंसे ये वर्ण हैं चार । जन्म-मृत्यू कैंचीसे छूटकर । ईश्वरके निकट धनुर्धर । पहुंचेंगे ही ॥ २४ ॥ जिस आत्म-प्रकृतिने यहां । सत्वा दिक गुणोंमें है जहां । लोगोंको ये चार कर्म यहां । बांट दिये हैं ॥ २५ ॥ पिताने बांटा जैसे जो संचित धन । सूर्यने राहीको पथ दिखाया जान । या उनके कर्म सेवकोंको अर्जुन । दिखाये हैं स्वामीने ॥ २६ ॥ इस भांति प्रवृत्तिने गुण । फैलाकर किये चार वर्ण । कर्म रूपसे जान अर्जुन । किया विस्तार ॥ २७ ॥ यहां तू सत्व-गुणसे जान । कम अधिक मिश्रण बन । हुवा इन दोनोंका नियोजन । ब्राह्मण क्षत्रिय ॥ २८ ॥ तथा है जो रज सात्विक । उससे रचे वैश्य लोक । रज तम मिलाके देख । हुए शूद्र ॥ २९ ॥ ऐसा एकही प्राणि वृंद । किया चतुवर्ण भेद । सुन वह गुण प्रबुद्ध । पांडुकुमार ॥ ८३० ॥ किया आप रखा जो जैसे । दीप-ज्योत दिखाती जैसे । गुण भिन्न कर्म भी वैसे । दिखाते शास्त्र ॥ ३१ ॥ वैसे अब कौन कौन । वर्ण विहित लक्षण । कहता कर श्रवण । सौभाग्य निधि तू ॥ ३२ ॥ सर्वेंद्रियोंकी सभी प्रवृत्तियां । अपने हाथमें ले धनंजया । बुद्धि मिलती है आत्मासे प्रिया । पतिव्रता जैसे ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८४
शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥ ब्राह्मणोंका स्वभाव धर्म— बुद्धिका जो ऐसे उपराम । इसके साथ जान तू राम । यह गुणोंका है उपक्रम । जिन कर्मोंमें ॥ ३४ ॥ बाह्य इंद्रियोंका यह जो झुंड । होता है धर्म-विरुद्ध उदंड । तब रोक लेता जो विधि-दंड । वही है दम ॥ ३५ ॥ करता जो शममें सहाय । वह गुण दम धनंजय । यह दूसरे गुणका कार्य । ब्रह्मकर्ममें ॥ ३६ ॥ जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत । वैसे ईश्वरकी बात । चितमें रखना ॥ ३७ ॥ इसका नाम है तप । तीसरे गुणका रूप । वैसे शौच भी निष्पाप । द्विविध यहां ॥ ३८ ॥ भावशुद्धिसे भरा हुवा मन । विहित कर्मसे भूषित तन । ऐसे जिसका सबाह्य जीवन । सजा हुवा है ॥ ३९ ॥ इसका नाम शौच है पार्था । ब्राह्मण-कर्मका गुण चौथा । तथा पृथ्वीके भांति सर्वथा । सभी सहना ॥ ८४० ॥ इसका नाम पांडव । गुण है कहा पांचवा । स्वरमें जैसे सुहाव । पंचम स्वर ॥ ४१ ॥ तथा टेडेमेडे किनारोंसे । सरल बहती गंगा जैसे । अथवा टेडे ईखमें जैसे । रहता रस सरल ॥ ४२ ॥ विश्वमें जीवोंके विषयमें । सरलतासे बरतनेमें । दीखता गुण जो कर्ममें । आर्जव है छटा ॥ ४३ ॥ तप शांति क्षमा श्रद्धा ज्ञान विज्ञान निग्रह । ऋजुता और पावित्र्य ब्रह्मकर्म स्वभावसे ॥ ४२ ॥ (४७) ७८५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जिस भांति माली संपन्न । जड़को सींचता अर्जुन । फलमें उसका दर्शन । करता है फिर ॥ ४४ ॥ वैसे शास्त्रानुसार आचरण । कर करना ईश्वर दर्शन । यही एक निश्चय अर्जुन । करना ज्ञान है ॥ ४५ ॥ ब्राह्मण कर्ममें ज्ञान । सातवा गुण है जान । विज्ञानका रूप सुन । कहता अब ॥ ४६ ॥ अंतःकरण शुद्धिके समय । शास्त्रका ध्यान बलसे विलय । ईश्वर तत्वमें होना निश्चय । बुद्धिका जान ॥ ४७ ॥ वास्तविक यह विज्ञान । आठवा है जो गुणरत्न । तथा आस्तिक्य भी सुन । गुण है नौवा ॥ ४८ ॥ राज-मुद्रा जिसके पास होती । जनता उसीको है मान देती । सच्छात्रोंसे जो भी स्वीकार होती । उसी राहको ॥ ४९ ॥ अति आदरसे जो मानता । उसीको मैं आस्तिक्य कहता । उसे नौवा गुण मैं कहता । इस स्थानपे ॥ ८५० ॥ ऐसे शमदमादिक । गुण हैं नौ निर्दोष । कर्म जान स्वाभाविक । ब्राह्मणके ये ॥ ५१ ॥ यह नौ गुण-रत्नाकर । या नवरत्नोंका है हार । प्रकाशको जैसे भास्कर । धारण करता ॥ ५२ ॥ या चंपक पुष्पसे चंपा पूजता । या चांदनीसे ही चंद्र उजलता । अथवा चंदन निजको चर्चिता । सौरभसे अपने ॥ ५३ ॥ नौ गुणोंका जड़ावू भूषण । धारण करता जो ब्राह्मण । कभी न छोड़ता तन मन । ब्राह्मणका उसे ॥ ५४ ॥ अब क्षत्रियको जो उचित । कर्म कहता तुझे निश्चित । बुद्धि सह तू देकर चित्त । सुन तू अब ॥ ५५ ॥ क्षत्रियोंका स्वभाव-धर्म— तेजमें कभी किसीका भानु । सहाय न चाहता अर्जुन । शिकारीमें सिंह कभी न- । चाहता सहाय ॥ ५६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८६
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥ ऐसे जो स्वाभाविक सशक्त । सहाय बिन उद्भट पार्थ । ऐसे श्रेष्ठ शौर्य विकसित । गुण है प्रथम ॥ ५७ ॥ तथा जैसे सूर्यका प्रताप । कोटि नक्षत्र करता लोप । किंतु उनसे न होता लोप । चंद्र सह भी वे हो तो ॥ ५८ ॥ ऐसे प्रौढ गुणमें पार्थ । विश्वको करता विस्मित । किंतु आप न विचलित । होता है कभी ॥ ५९ ॥ ऐसा प्रगल्भ रूप जो तेज । क्षात्र-धर्मका गुण है दूजा । इसी भांति धैर्य है सहज । गुण तीसरा ॥ ८६० ॥ टूट पडा भी यदि आकाश । बुद्धिकी आंखें कभी मानुस । मिटता नहीं है स-साहस । वही है धैर्य ॥ ६१ ॥ तथा पानी कितना ही गहरा होता । कमल ऊपर आकर ही खिलता । या आकाश किसीसे नहीं हारता । ऊंचाईमें कभी ॥ ६२ ॥ कैसी ही विवश अवस्था । जीवनमें पाकर पार्था । न छेदती प्रज्ञा सर्वथा । स्थिर बुद्धिकी ॥ ६३ ॥ ऐसी दक्षता है जो चोख । यह है चौथा गुण देख । तथा जूझ जो अलौकिक । गुण पांचवा ॥ ६४ ॥ जैसे सूर्यमुखीका पुष्पक । सदा सूर्यकी ओर उन्मुख । वैसे वह शत्रुके सन्मुख । होता है सदा ॥ ६५ ॥ यत्न-पूर्वक गर्भिणी जैसे । टालती है पुरुषको वैसे । समरमें पीठ दिखानेसे । बचता रहता ॥ ६६ ॥ क्षत्रियोंका यह आचार । पांचवा गुणेंद्र धनुर्धर । पुरुषार्थीके सिरपर । भक्ति है जैसे ॥ ६७ ॥ शौर्य धैर्य प्रजा रक्षा युद्धमें अपलायन । दातृत्व दक्षता तेज क्षात्र-धर्म स्वभावसे ॥ ४३ ॥ ७८७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
लगे हुए अपने फल फूल । देनेमें वृक्ष उदार सरल । अथवा देता जैसा परिमल । कमलवन ॥ ६८ ॥ जितना जो चाहता उतना । चंद्रका उसे चांदनी देना । वैसे चाहनेवालेको देना । इच्छानुसार ॥ ६९ ॥ ऐसा अपरमित दान । जहां है छटा गुण रत्न । तथा आज्ञाका एक स्थान । होता है सदा ॥ ८७० ॥ करके अवयवोंका पोषण । उनसे सेवा लेता अनुदिन । ऐसे करके प्रजानुरंजन । भोगना प्रजासुख ॥ ७१ ॥ उसका नाम है ईश्वर-भाव । सब सामर्थ्यका है वही ठाव । सब गुणोंमें यह महाराव । क्षत्रियोंके ॥ ७२ ॥ ऐसे हैं शौर्यादि सात गुण । जिससे हैं विशेष भूषण । सप्त ऋषीसे शोभता गगन । वैसे ही है यह ॥ ७३ ॥ सात गुणोंसे जो विचित्र । विश्वमें है कर्म पवित्र । यह जान सहज क्षात्र- । धर्म है क्षत्रियोंका ॥ ७४ ॥ ऐसे क्षत्रिय नहीं है नर । स्वत्व-स्वर्णका मेरु डोंगर । तमी है स्वर्गके वे आधार । गुण है सात ॥ ७५ ॥ अथवा जो सात गुणार्णव । घेरे हैं पृथ्वि सह वैभव । भोगता है क्षत्रिय पांडव । इस प्रकार ॥ ७६ ॥ अथवा है इस गुण-प्रवाहसे । क्रिया-गंगा उसके अंगमें जैसे । मिलके जगमें महा सागरसे । शोभती है ॥ ७७ ॥ किंतु यह रहने दे देख । शौर्यादिक जो हैं गुणात्मक । सात कर्म हैं जो स्वाभाविक । क्षत्रिय जनके ॥ ७८ ॥ अब जो वैश्यको उचित । गुण कहता जो निश्चित । उनको सुन अब पार्थ । ध्यान पूर्वक ॥ ७९ ॥ वैश्य तथा शूद्रोंका कर्म— भूमि बीज और हल । इसका लेकर बल । जोड़ना लाभ अतुल । जिनका काम ॥ ८८० ॥ ज्ञानेश्वरी ७८८
अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग
कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ अथवा कृषिसे है जीना । गोधनकी रक्षा करना । अधिक मूल्यमें बेचना । स्वस्त वस्तु ॥ ८१ ॥ इतना ही है धनंजय । वैश्य-कर्मका समुदाय । वैश्यका गुण-समुच्चय । इतना जान ॥ ८२ ॥ तथा वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण । द्विजन्मके हैं ये तीनों वर्ण । इन सबका जो शुश्रूषण । कर्म है शूद्रका ॥ ८३ ॥ द्विज-सुश्रूषासे पर । शूद्र कर्म ना यहांपर । वर्णोचित है धनुर्धर । दिखाये कर्म ॥ ८४ ॥ स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ वर्णानुसार सहज कर्म ही अधिकार है— भिन्न भिन्न वर्णोंको उचित । कर्म इसी प्रकार हैं पार्थ । जैसे इंद्रियोंको है उचित । शब्दादिक विषय ॥ ८५ ॥ अथवा मेघसे जो चूता । पानीको उचित सरिता । सरिताको है पांडुसुता । उचित है सिंधु ॥ ८६ ॥ वर्णाश्रम वश जैसे । करणीय कार्य ऐसे । गोरेकी गौरता जैसे । होती स्वाभाविक ॥ ८७ ॥ वह है जो स्वाभाविक कर्म । शास्त्रानुसार ही वीरोत्तम । करनेमें ही उत्कट प्रेम । ऐसे रहता ॥ ८८ ॥ खेती व्यापार गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावसे । करना प्राप्त सेवा जो शूद्र-कर्म स्वभावसे ॥ ४४ ॥ जो है स्व-कर्ममें दक्ष पाता है मोक्ष निश्चित । मोक्ष कैसा सुनो पाता स्वकर्म दक्ष जो नर ॥ ४५ ॥ ७८९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
होता है यदि अपना ही रत्न । कराता जौहरीसे परीक्षण । वैसे शास्त्रानुसार निरीक्षण । करना कर्मका ॥ ८९ ॥ जैसे दृष्टि होती है अपने पास । दीपके बिन उपयोग न खास । या पथ नहीं जानने पर विशेष । जैसे हैं पैर ॥ ८९० ॥ तभी जो है वर्णानुसार । सहज होता अधिकार । आप हो शास्त्रोंसे गोचर । करता आप ॥ ९१ ॥ जो है घरकी ही धरोहर । दीप दिखाता है धनुर्धर । उठानेमें कह तू फिर । आलस कैसे ॥ ९२ ॥ स्वाभाविक ही जो पाया । शास्त्रोंसे सही कहा गया । विहित कर्म अपनाया । आचरणमें जो ॥ ९३ ॥ आलसको छोड़कर । फलाशाको तज कर । तन मन एक कर । देना आरंभमें ॥ ९४ ॥ प्रवाह-बद्ध होकर बहता । पानी भिन्न दिशामें नहीं जाता । वैसे ही शास्त्रोचित आचरता । अपना कर्म ॥ ९५ ॥ इस प्रकारसे जो पार्थ । स्वयं कर्म करता विहित । करता है मोक्ष-द्वार प्राप्त । इस ओरका ॥ ९६ ॥ अकरणीय और निषिद्ध । कर्मसे न रखना संबंध । तभी तो वह भव-बद्ध । नहीं होता ॥ ९७ ॥ शास्त्रोक्त निष्काम कर्मसे आत्म-ज्ञान मिलता है— तथा काम्य-कर्मकी ओर । दृष्टिपात भी नहीं कर । स्वर्गका भी चंदन-द्वार । रोकता वह ॥ ९८ ॥ वैसे ही अन्य जो है नित्य-कर्म । फल-त्यागसे किये निष्काम । इसीलिये है मोक्षकी सीम । पायी उसने ॥ ९९ ॥ ऐसे शुभाशुभ संसार । तज कर जो धनुर्धर । वैराग्य मोक्ष-द्वार पर । आ के खडा हुवा ॥ ९०० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९०