भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 850, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 850

आगको न छोड़ता ताप । तथा वैरको नहीं सांप । विश्वका वैरी है वासिप । अखंडित ॥ ५९ ॥ अथवा शरीरको काल । न भूलता कभी निर्मल । वैसे ही तममें अचल । रहता मद ॥ ७६० ॥ ऐसे ये पांच निद्रादिक । तामसके रहते दोष । इसका आधार जो एक । धृति तामस ॥ ६१ ॥ कर्म बुद्धि तथा धृतिका संबंध— कहलाती है ऐसी धृति । जानना तामस सुमति । ऐसा कहता विश्व-पति । धनुर्धरसे ॥ ६२ ॥ इस प्रकार त्रिविध बुद्धि । करती कर्म निश्चय आदि । धृति बनाती उसकी सिद्धि । तदनंतर ॥ ६३ ॥ सूर्यादिसे दीखता पथ । चलना होता पैरोंको नित । किंतु चलना धैर्यसे पार्थ । होता निरंतर ॥ ६४ ॥ वैसे बुद्धि कर्मको दिखाती । इंद्रियां उसको हैं करतीं । करनेमें जो अपेक्षा होती । धैर्यकी सदा ॥ ६५ ॥ तब यह सब तेरे प्रति । कहा है मैंने त्रिविध धृति । इससे होती कर्म निष्पत्ति । होने पर तब ॥ ६६ ॥ त्रिविध कर्मके फल उत्पन्न । होने पर उसे सुख कहते जान । वह भी त्रिविध होता अर्जुन । कर्म परसे ॥ ६७ ॥ फल रूप यह सुख । त्रिगुणसे भिदा देख । मीमांसा इसकी नेक । करूंगा शुद्ध ॥ ६८ ॥ किंतु शुद्ध है वह कैसे कहूंगा । कानोंसे ग्रहण करना चाहेगा । कान तथा हाथका मल लगेगा । इस शुद्धताको ॥ ६९ ॥ इससे करके तू अनादर । श्रवण होता है जो बाहर । सुन अंतःकरण देकर । जीवभावसे ॥ ७७० ॥ ज्ञानेश्वरी ७७८

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 850, कुल 1172 में से · BharatKosha