ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
तामसी धृतिके लक्षण— सभी अधम गुणोंसे । आ जाता है रूप जिसे । कोयला जो कालिमासे । बनता है ॥ ४९ ॥ अजी ! प्राकृत तथा हीन । उसको भी गुणका मान । नाम होता है पुण्यजन । दैत्यका जैसे ॥ ७५० ॥ नवग्रहमें जो है पिंगल । उसको कहते हैं मंगल । वैसे तममें गुण केवल । अविचार मात्र ॥ ५१ ॥ सब दोषोंका आश्रय स्थान । तमसे सान कर अर्जुन । अंगांग जिस नरका मान । बनाये गये हैं ॥ ५२ ॥ आलसको पकड़ बैठता । निद्राका मानो घर ही बनता । पापसे जो सगा ही रहता । छूटे दुःखसे कैसे ॥ ५३ ॥ तन धनके मोहसे अर्जुन । नहीं छूटता भयका कारण । पत्थर न छोड़ता कडापन । उसी प्रकार ॥ ५४ ॥ पदार्थ जातमें आस रखता । इससे शोकका घर बनता । पापसे कभी छूट न सकता । कृतघ्न जैसे ॥ ५५ ॥ जीव-भावसे असंतोष । धरके रखा अहर्निश । इससे मैत्री है विशेष । विषादसे नित ॥ ५६ ॥ ल्हसुन छोडती नहीं दुर्गंधी । तथा कुपथ्यको न छोडती व्याधी । इसी भांति इसको मरणावधी । विषाद् न छूटता ॥ ५७ ॥ तथा तारुण्य वित्त काम । इससे बढ़ता संभ्रम । तमी है भयका आश्रम । बनता वह ॥ ५८ ॥
निद्रा भय न जो छोडे शोक खेद तथा मद । ओढती बुद्धिपे तंद्रा वह है धृति तामस ॥ ३५ ॥
७७७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग