ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधोर्ध्वकी मर्यादा तोड़कर । प्राण नवोंकी गांठ बांधकर । बैठा रहता है डूब कर । सुषुम्नामें ॥ ३९ ॥ संकल्प विकल्प पट । खोल होता मन प्रकट । बुद्धिके पीछे जा सुभट । बैठता वह ॥ ४० ॥ इस धृतिके कारण । मन प्राण और करण । स्वचेष्टाका संभाषण । छोड देते हैं ॥ ४१ ॥ मन प्राणादि फिर संपूर्ण । ध्यानके अंतर्गृहमें जान । बंद कर रखता अर्जुन । योगसे वह ॥ ४२ ॥ फिर जो परमात्मचक्रवर्ती । स्वाधीन होनेकी होती निश्चिती । तब तक छूट न होके धृती । बांध रखती उन्हे ॥ ४३ ॥ यहां जो वही धृती । सात्विक कहलाती । ऐसे जो लक्ष्मी-पति । कहता पार्थसे ॥ ४४ ॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसंगेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ राजसी धृतिके लक्षण— शरीर ही आप मान कर । स्वर्ग संसारके दोनों घर । भोगना चाहता पेट भर । त्रिवर्गोपायसे ॥ ४५ ॥ मनोरथके समुद्र पर । धर्मार्थकामके नांव पर । धैर्य-बलसे क्रिया व्यापार । करता है जो ॥ ४६ ॥ कर्मकी पूंजी जो डालना । उसका चौगुना चाहना । इतना सायास करना । जिसका धैर्य ॥ ४७ ॥ वह धृति है राजस । सुन तू पार्थ विशेष । तीसरी है जो तामस । कहता हूं अब ॥ ४८ ॥ धर्मार्थ काम सारे ही चलाती लाभ देखके । डुबाती फल-आशामें वह है धृति राजसी ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७६