ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसे किसीसे न पूछकर । तामस मानना धनुर्धर । जिस बुद्धिको धर्मार्थ वैर । क्या करना वह ॥ २९ ॥ ऐसे ये बुद्धिके भेद । किये तुझसे विशद । स्वबोध कुमुद चंद्र । कहे तुझसे ॥ ७३० ॥ अब इसकी जो बुद्धि वृत्ति । सभी कर्मको आधार होती । कैसी वह त्रिविध धृति । कहता हूं तुझे ॥ ३१ ॥ उस धृतिके जो विभाग । तीन होते हैं यदा लिंग । कहता हूं उसे सुभग । सुन तू अब ॥ ३२ ॥ धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥ सात्त्विक धृतिके लक्षण— उदय होते ही दिनकर । मिटता चौर्य सह अंधार । अथवा राजाज्ञा अव्यापार । रोकती जैसे ॥ ३३ ॥ अथवा पवनका जो वेग । चलता रहता है सवेग । मिटते गर्जन सह मेघ । अपने आप ॥ ३४ ॥ या अगस्तके होते दर्शन । सिंधु धारण करता मौन । चंद्रोदयमें कमल-वन । सिमिटते हैं ॥ ३५ ॥ जैसे मदोन्मत्त कुंजर । चलनेमें उठाके पैर । न रखता है भूमिपर । देखके सिंह ॥ ३६ ॥ ऐसे होते हैं जो धीर । उपजते ही अंतर । मनादिकके व्यापार । तजते वहीं ॥ ३७ ॥ इंद्रिय विषयक जो गांठ । आप ही छूटती है सुभट । घुसते मन-मायके पेट- । में दसो जन ॥ ३८ ॥ चलाती जो क्रिया सारी मन इन्द्रिय प्राणकी । समता स्थिरतासे जो वह है धृति सात्त्विक ॥ ३३ ॥ ७७५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग