ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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या जिसे फूलोंका मकरंद भाता । अथवा काठ कुरेदना सुहाता । न होती दोनोंमें कोई विसंगतता । भ्रमरके लिये ॥ १९ ॥ वैसे यहां कार्याकार्य । धर्माधर्मका विषय । न होते कोई निर्णय । आचरणसे ॥ ७२० ॥ अजी ! आंखके बिन लेते मोती । उसमें फंसनेकी सदा भीती । कभी सफलता भी मिलती । आश्चर्यसे ही ॥ २१ ॥ वैसे जो अकरणीय होता । सम्मुख आनेसे रह जाता । तभी तो करनेसे छूटता । नहीं तो दोनों एक ॥ २२ ॥ बुद्धि वह उचित अनुचित । नहीं जानती कुछ भी पार्थ । विवाहमें जिस भांति अक्षत । डालते हैं लोग ॥ २३ ॥ अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥ तामसिक बुद्धिके लक्षण— होता जो राजाका राज पथ । चोरोंको होता है विपरीत । उदय होते ही माने रात । राक्षस जैसे ॥ २४ ॥ पुरुष होता है जो भाग्यहीन । उसे कोयला होता गढा धन । ऐसे होकर भी न होता धन । उस जीवको ॥ २५ ॥ वैसे धर्ममात्र जो है केवल । उसकी बुद्धि जो है पाप मल । सत्यको मानती असत्य मूल । तामस बुद्धि ॥ २६ ॥ मानते सब जिसे अर्थ । उसको संपूर्ण अनर्थ । जो जो गुण है व्यवस्थित । उसे मानता दोष ॥ २७ ॥ अथवा मानो श्रुति जात । अनुकरण करते पार्थ । वह सबही विपरीत । मानती वह ॥ २८ ॥
तमसे भरके जो है धर्म माने अधर्मको देखती उल्टा अर्थ वह है बुद्धि तामसी ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७४