भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 845

वह जो कर्म काम्यादिक । है संसार भय-दायक । अकरणीय है तू देख । कहा गया है ॥ ९ ॥ उस अकार्य कर्ममें । जन्म मरण कालमें । प्रवृत्ति सदा पीछेमें । भागती है ॥ ७१० ॥ जैसे आगमें नहीं घुसता । अथाह पानीमें न कूदता । प्रज्वलित शूल न धरता । उसी प्रकार ॥ ११ ॥ या काला नाग जो फूत्करता । उसे देख पकड़ा न जाता । व्याघ्र गुहामें घुसा न जाता । उसी प्रकार ॥ १२ ॥ वैसे कर्म अकरणीय । देखके होता महाभय । उपजाती जो असंशय । बुद्धि सात्विक ॥ १३ ॥ जैसे विष मिश्रित अन्न । देख होता मृत्युका ज्ञान । निषिद्ध कर्ममें भान । होता कर्मका वैसे ॥ १४ ॥ फिर जो बंध भय भरित । होता है निषिद्ध कर्म प्राप्त । निर्विकार जानता निवृत्त । होनेका वह ॥ १५ ॥ ऐसे ही कार्याकार्य विवेक । या प्रवृत्ति-निवृत्तिमापक । जैसे रत्न-पारखी परख । करता जौहरी ॥ १६ ॥ वैसे कार्याकार्य शुद्धि । जानती जो निरवधि । कहाती सात्त्विक बुद्धि । यह तू जान ॥ १७ ॥ यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥ राजसिक बुद्धिका लक्षण— बगुलोके गांवमें जैसे । चलता नीरक्षीर वैसे । या अंधा न जानता जैसे । दिवस रात्र ॥ १८ ॥ कार्य अकार्य कैसे क्या क्या है धर्म अधर्म जो । न जान सकती स्वच्छ जान तू बुद्धि राजस ॥ ३१ ॥ ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग