ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥ सात्त्विक बुद्धिके लक्षण- तभी अधिकारसे मान लिया । तथा विधि प्रवाहसे जो आया । वह एक ही भला कहलाया । नित्यकर्म ॥ ९९ ॥ वही आत्म-प्राप्ति फल । दृष्टि रखके केवल । प्यासमें जैसा है जल । सेवन योग्य ॥ ७०० ॥ इतनेसे ही वह जो कर्म । छुडाता जन्म-भय विषम । तथा कर देता है सुगम । मोक्ष-सिद्धि ॥ १ ॥ ऐसे कर्मको है करता । संसार भयसे छूटता । करणीयत्वमें बढता । मुमुक्ष पदमें ॥ २ ॥ वहां जो बुद्धि ऐसा । बंधाती है भरोसा । मोक्ष रखा हुवासा । मिलेगा ही ॥ ३ ॥ इसीलिये रची जैसे निवृत्ति । तलमें आधार डाल प्रवृत्ति । इस कर्ममें डुबकी लगाती । इतनेमें ही ॥ ४ ॥ तृषार्थ जैसे पानीसे जीता । पूरमें नांव है तरता । या अंधार कूपसे छूटता । सूर्य प्रकाशसे ॥ ५ ॥ नाना पथ्यसे औषध लेता । ऐसे रोग-ग्रस्त भी बचता । या मछलीको पानी मिलता । तब जैसे वह ॥ ६ ॥ निश्चय-पूर्वक बचता । उसमें न होता अन्यथा । वैसे कर्म-प्रवृत्त होता । मिलता मोक्ष ॥ ७ ॥ कर्म रहता जो करणीय । वहां पूर्ण ज्ञान धनंजय । तथा रहता अकरणीय । कहा है आगे ॥ ८ ॥ क्या कर्तव्य अकर्तव्य बंध मोक्ष भयाभय । धरना तजना जाने वह है बुद्धि सात्त्विक ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ७७२