भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसे कह करके देव । त्रिविध सुखका प्रस्ताव । निरूपते हैं सावयव । इस प्रकारके ॥ ७१ ॥ सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखांतं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ तीन प्रकारके सुखका विवेचन— कहूंगा सुखत्रय संज्ञा । ऐसी की है मैंने प्रतिज्ञा । कहता हूं सुन तू प्राज्ञ । इस समय ॥ ७२ ॥ जीव करता जब आत्मालिंगन । तब अनुभव करता अर्जुन । उस प्रकारका कराता मैं दर्शन । तुझको अब ॥ ७३ ॥ किंतु मात्राके नापसे जैसे । दिव्यौषधियां लेते हैं वैसे । या रांगेको रस भावनासे । बनाते हैं चांदी ॥ ७४ ॥ अथवा जैसे नूनका नीर । करना हो तो दो चार बार । देने पड़ते उसको मार । पानीके जैसे ॥ ७५ ॥ वैसे प्राप्त सुख लेशसे । जीवको भावना देनेसे । नासता है भावाभ्याससे । जीवका दुःख ॥ ७६ ॥ ऐसा जो आत्म-सुख । हुआ यहां त्रिगुणात्मक । वह भी कहता हूं देख । उसका रूप ॥ ७७ ॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥ सात्विक सुखका लक्षण— जैसे चंदनकी जड़ । सर्पसे रहता अड़ । या निधानका किवाड । पिशाचके हाथमें ॥ ७८ ॥ कहता सुन तू पार्थ सुख तीन प्रकारके । अभ्याससे रमाता जो दिखाता अंत दुःखका ॥ ३६ ॥ आदि जो विषसा तीता अंतमें अमृतोपम । आत्मामें शुद्ध बुद्धीको मिलता सुख सात्विक ॥ ३७ ॥ ७७९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग