ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया स्वर्गके सुंदर भोग । रोक रखते हैं जो याग । अथवा दुःखके प्रसंग । बालत्वमें जैसे ॥ ७९ ॥ होनेमें जैसे दीपकी सिद्धि । कठिनाई घूमकी है आदि । अथवा होती है दिव्योोषधि । जीभको दुःखद ॥ ७८० ॥ इस प्रकार सुन अर्जुन । जिस सुखका उगम-स्थान । यम दम आदिके कारण । होता है विषम ॥ ८१ ॥ करना सभी स्नेहका दमन । वैराग्य उत्पन्न होता अर्जुन । स्वर्ग संसार सीमाका बंधन । रहता है दूर ॥ ८२ ॥ विवेक श्रवणका अति त्रास । तथा व्रताचरण है कर्कश । करते हैं बुद्धि आदिका नाश । रात्रिदिवस ॥ ८३ ॥ मुखसे सुषुम्नाके । ढेर प्राणायामके । पडते हैं ढेर ढेरके । निगलना तब ॥ ८४ ॥ जैसे चक्रवाकके विरहमें होता । या शिशुको स्तनसे छुडानेमें होता । भूखेको थालीसे उठानेमें जो होता । उससे अधिक दुःख ॥ ८५ ॥ माताके सामनेसे बालक । छीनता है काल जब एक । अथवा छूटता है उदक । मीनसे जब ॥ ८६ ॥ वैसे विषयोंका घर है पार्थ । तजनेमें इंद्रियोंको युगांत । होता तब धीर सहता नित । वैराग्यशाली ॥ ८७ ॥ ऐसे जिस सुखका प्रारंभ । दिखाता है काठिण्यका क्षोभ । फिर होता क्षीराब्धिमें लाभ । अमृतसा अंतमें ॥ ८८ ॥ प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य शंभुने गला । तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ८९ ॥ चुभता अगसे भी तीखा । कच्चापन हरे द्राक्षका । पक्तामें जैसे उसका । माधुर्य रहता ॥ ७९० ॥ इस वैराग्यादिका भी वैसा । सुपक्व आत्म-प्रकाशमें वैसा । वैराग्य सह होता हे नाशसा । अविद्याजातका ॥ ९१ ॥ तब जैसे गंगा सागरमें । बुद्धि विलीन होती आत्मामें । अद्वयानंदकी अपनेमें । खुलती खान ॥ ९२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८०