भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसे स्वानुभव विश्राम। वैराग्य-मूलका परिणाम । उस सुखको सात्विक नाम । दिया गया है ॥ ९३ ॥ विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥ राजस सुखके लक्षण- मिलती जब विषय इंद्रियां । छूता है जो सुख उस समय । दोनों किनारोंको हे धनंजय । उफानमें आकर ॥ ९४ ॥ अधिकारी आते जब गांव । होता है जब जैसा उत्सव । अथवा ऋण लेके विवाह । विस्तार होता ॥ ९५ ॥ या रोगीकी जीभमें जैसे । केला-बूरा भाता है वैसे । बचनाग पहले जैसे । लगता मीठा ॥ ९६ ॥ प्रवास-चौर्यके पहले मित्र । या हाट बातका कलत्र । होते उनके विनोद विचित्र । उसी प्रकार ॥ ९७ ॥ वैसे जो विषयेंद्रियोंका मिलन । करता जीवके सुखमें पोषण । फिर जैसे चट्टानको रत्न मान । मरता हंस जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे खर्चके सारा उत्पन्न । मिटता जीवन संपन्न । क्षीण होता सुकृतका धन । जीवका सारा ॥ ९९ ॥ तथा जब सब भोग मिटता । तब वह मात्र स्वप्नसा होता । फिर केवल मात्र जो रहता । हानिका भार ॥ ८०० ॥ विपत्ति है ऐसे जो सुख । ऐहिक परिणाम देख । परमें बनके जो विष । उलटता है ॥ १ ॥ करनेसे लाड़ विषयोंके । जला करके खेत धर्मके । भोग किये नाना उत्सवके । विषयोंसे वहां ॥ २ ॥ पहला लगता मीठा अंतमें विष मारक । विषय योगसे पाती इंद्रियां सुख राजस ॥ ३८ ॥ ७८१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग