भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 854, कुल 1172 में से

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पातकोंमें तब आता बल । नरकमें देते हैं वे खल । उस सुखने किया है छल । अंतमें ऐसे ॥ ३ ॥ बछनाग विष है मधुर । किंतु अंतमें मारक क्रूर । वैसे पहले होता मधुर । अंतमें कटु ॥ ४ ॥ यह सुख निःसंदेह पार्थ । रजो गुणसे बना है सार्थ । इसीलिये न छूना सुखार्थ । इसका अंग ॥ ५ ॥ यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ तामसिक सुखके लक्षण— करके अपेयका पान । तथा अखाद्यका भोजन । और पर-स्त्री-सन्निधान । देता है जो सुख ॥ ६ ॥ या दूसरोंका कर संहार । और कर परस्वापहार । होता है सुखका अवतार । भाटोंके मुखसे ॥ ७ ॥ आलस्यमें होता जिसका पोषण । या निद्रामें होते हैं अनुभव जान । जिसका आद्यंत भुलाता अर्जुन । अपने पथको ॥ ८ ॥ जो कुछ है वह पार्थ । तामस मान यथार्थ । इसमें सुखकी बात । असंभाव्य ॥ ९ ॥ मूलमें कर्मके तीन प्रकार । इससे सुख भी तीन प्रकार । यह सब तुझे शास्त्रानुसार । कह दिया मैंने ॥ ८१० ॥ कर्ता कर्म तथा कर्म-फल । यह त्रिपुटि एक केवल । इसके बिना न सूक्ष्म-स्थूल । कुछ भी यहां ॥ ११ ॥ तथा यह जो त्रिपुटि । तीनों गुणोंमें किरीटी । बुनी गयी है जो पर्टी । तंतु समान ॥ १२ ॥ निद्रा प्रमाद आलस्य आत्माको घेरके सदा । आदि औ' अंतमें जो है भुलाता सुख तामस ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८२

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