ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ अथवा कृषिसे है जीना । गोधनकी रक्षा करना । अधिक मूल्यमें बेचना । स्वस्त वस्तु ॥ ८१ ॥ इतना ही है धनंजय । वैश्य-कर्मका समुदाय । वैश्यका गुण-समुच्चय । इतना जान ॥ ८२ ॥ तथा वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण । द्विजन्मके हैं ये तीनों वर्ण । इन सबका जो शुश्रूषण । कर्म है शूद्रका ॥ ८३ ॥ द्विज-सुश्रूषासे पर । शूद्र कर्म ना यहांपर । वर्णोचित है धनुर्धर । दिखाये कर्म ॥ ८४ ॥ स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ वर्णानुसार सहज कर्म ही अधिकार है— भिन्न भिन्न वर्णोंको उचित । कर्म इसी प्रकार हैं पार्थ । जैसे इंद्रियोंको है उचित । शब्दादिक विषय ॥ ८५ ॥ अथवा मेघसे जो चूता । पानीको उचित सरिता । सरिताको है पांडुसुता । उचित है सिंधु ॥ ८६ ॥ वर्णाश्रम वश जैसे । करणीय कार्य ऐसे । गोरेकी गौरता जैसे । होती स्वाभाविक ॥ ८७ ॥ वह है जो स्वाभाविक कर्म । शास्त्रानुसार ही वीरोत्तम । करनेमें ही उत्कट प्रेम । ऐसे रहता ॥ ८८ ॥ खेती व्यापार गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावसे । करना प्राप्त सेवा जो शूद्र-कर्म स्वभावसे ॥ ४४ ॥ जो है स्व-कर्ममें दक्ष पाता है मोक्ष निश्चित । मोक्ष कैसा सुनो पाता स्वकर्म दक्ष जो नर ॥ ४५ ॥ ७८९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग