भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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होता है यदि अपना ही रत्न । कराता जौहरीसे परीक्षण । वैसे शास्त्रानुसार निरीक्षण । करना कर्मका ॥ ८९ ॥ जैसे दृष्टि होती है अपने पास । दीपके बिन उपयोग न खास । या पथ नहीं जानने पर विशेष । जैसे हैं पैर ॥ ८९० ॥ तभी जो है वर्णानुसार । सहज होता अधिकार । आप हो शास्त्रोंसे गोचर । करता आप ॥ ९१ ॥ जो है घरकी ही धरोहर । दीप दिखाता है धनुर्धर । उठानेमें कह तू फिर । आलस कैसे ॥ ९२ ॥ स्वाभाविक ही जो पाया । शास्त्रोंसे सही कहा गया । विहित कर्म अपनाया । आचरणमें जो ॥ ९३ ॥ आलसको छोड़कर । फलाशाको तज कर । तन मन एक कर । देना आरंभमें ॥ ९४ ॥ प्रवाह-बद्ध होकर बहता । पानी भिन्न दिशामें नहीं जाता । वैसे ही शास्त्रोचित आचरता । अपना कर्म ॥ ९५ ॥ इस प्रकारसे जो पार्थ । स्वयं कर्म करता विहित । करता है मोक्ष-द्वार प्राप्त । इस ओरका ॥ ९६ ॥ अकरणीय और निषिद्ध । कर्मसे न रखना संबंध । तभी तो वह भव-बद्ध । नहीं होता ॥ ९७ ॥ शास्त्रोक्त निष्काम कर्मसे आत्म-ज्ञान मिलता है— तथा काम्य-कर्मकी ओर । दृष्टिपात भी नहीं कर । स्वर्गका भी चंदन-द्वार । रोकता वह ॥ ९८ ॥ वैसे ही अन्य जो है नित्य-कर्म । फल-त्यागसे किये निष्काम । इसीलिये है मोक्षकी सीम । पायी उसने ॥ ९९ ॥ ऐसे शुभाशुभ संसार । तज कर जो धनुर्धर । वैराग्य मोक्ष-द्वार पर । आ के खडा हुवा ॥ ९०० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९०

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