ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसकल भाग्यकी है जो सीमा । तथा है मोक्ष लाभकी प्रमा । विविध कर्ममागोंका श्रम । शांत होता यहां ॥ १ ॥ मोक्ष-फलका जो दिया हुवा ओल । अथवा सुकृत तरुका है फूल । वैराग्य कमल पर अलिकुल । बैठता जैसे ॥ २ ॥ जैसे आत्म-ज्ञान सुदिनका । वार्ता देनेवाले अरुणका । उदय होता है वैराग्यका । उस समय ॥ ३ ॥ अथवा मानो वह आत्म-ज्ञान । हाथमें जिससे आता निधान । उस वैराग्यका है दिव्यांजन । आता है बुद्धिमें ॥ ४ ॥ ऐसी जो मोक्षकी योग्यता । सिद्ध होती है पांडुसुता । विहित कर्म जो करता । उसको सदैव ॥ ५ ॥ यह विहित कर्म जो अर्जुन । अपना मानो अनन्य जीवन । गुरु सर्वात्मकका है पूजन । श्रेष्ठ तम जो ॥ ६ ॥ या संपूर्ण भोग सह् जैसे । पतिव्रता रमती पतिसे । उसी क्रियाको कहते वैसे । किया सभी तप ॥ ७ ॥ या बालकको माताके बिन । दूसरा क्या है अन्य साधन । तभी है माताकी गोद मान । उसका धर्म ॥ ८ ॥ केवल पानी ही मान मीन । गंगाको नहीं तजके जान । पाता जैसे सभी तीर्थ स्थान । सागर सहज ॥ ९ ॥ वैसे है अपने जो विहित । उपाय स्मरनेसे सतत । ऐसे करता कि जगन्नाथ । मानले भार ॥ ९१० ॥ अजी ! जिसको जो विहित । ईश्वरका है मनोगत । मान करनेसे निभ्रांत । मिलता वह ॥ ११ ॥ अजी ! मनमें जो उतरती । दासी भी है स्वामिनी बनती । शीस देकर होती जो प्राप्ति । स्वामीकी कृपा ॥ १२ ॥ वैसे स्वामीका है मनोभाव । न चूकता है परम सेवा । यह छोड दूसरा पांडव । केवल वाणिज्य ॥ १३ ॥ ७९१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग