ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विंदति मानवः ॥ ४६ मोक्षके लिये स्वधर्ममें आस्था अनिवार्य है— तभी है विहित क्रिया करना । मानो ईश्वरकी आज्ञा पालना । जिससे प्राप्त हुवा है अर्जुन । आकार भूतोंको ॥ १४ ॥ टुकडोंसे जो अविद्याके । बनाकर गुड्डे उनके । खिलाता है तीन गुणोंके । अहंकार सूत्रसे ॥ १५ ॥ जिससे यह विश्व समस्त । अंतर्बाह्य संपूर्ण भरित । रहते हैं जैसे दीप जात । तेजसे वैसे ॥ १६ ॥ वह सर्वात्मक ईश्वर । स्वकर्म कुसुमसे वीर । पूजा जाता जब अपार । तोषता वह ॥ १७ ॥ तब है जैसी पूजासे । संतुष्ट आत्म-रामसे । मिलता अति प्रेमसे । वैराग्य-प्रसाद ॥ १८ ॥ उस वैराग्य-प्रसादके कारण । होता है सतत ईश-चिंतन । नहीं सुहाता अन्य कुछ मान । वमन है सारा ॥ १९ ॥ जैसे प्राणनाथके वियोगमें । वियोगिनी दुःख पाती जीनेमें । चुभते सारे सुख भोगनेमें । दुःख रूप ॥ १२० ॥ उदय न होते सम्यग्ज्ञान । ध्यानसे तन्मयता अर्जुन । आती है ऐसी योग्यता जान । बोधसे ही ॥ २१ ॥ इसीलिये जो मोक्ष-लाभार्थ । तनसे आचरता है व्रत । उसे स्वधर्ममें आस्था पार्थ । रखनी ही होगी ॥ २२ ॥ स्वधर्मसे नियत-कर्म स्वभावके दोषोंको दूर कहता है— अजी है अपना जो स्वधर्म । आचरणमें यदि विषम । तो भी देखना है परिणाम । फळता जो ॥ २३ ॥ विस्तार जिसका विश्व प्रेरता प्राणिमात्र जो । उसको पूजके मोक्ष पाता स्वकर्म पुष्पसे ॥ ४६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९२