भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥ अपने हितके लिये सब । नीम है सुख दायक जब । उसके तीतापनसे तब । उक्तायें कैसे ॥ २४ ॥ फलनेसे प्रथम जैसे । आशा भंग होता केलेसे । इसीलिये उखाडनेसे । फल मिलेगा क्या ॥ २५ ॥ स्वधर्मका आचरण । करना जान कठिन । तजा तो मोक्ष अर्जुन । मिलेगा कहां ? ॥ २६ ॥ तथा अपनी जो माता । कुलटा होनेसे पार्था । तो भी होते हैं जीविता । स्नेह न होता टेढा ॥ २७ ॥ अथवा जो है परकीय । रंभासे सुंदर काय । उससे मिले क्या स्तन्य । बालकको कभी ॥ २८ ॥ अजी ! पानीसे भी बहुत । गुणमें उत्तम घृत । इससे कह मीन पार्थ । रहेगा क्या उसमें ॥ २९ ॥ विश्वको होता है जो विष । जंतुओंका वह पीयूष । तथा विश्वका गुड देख । विष है उनको ॥ ९३० ॥ इसीलिये है जो शास्त्र-विहित । कर्मसे खुलता भव अंकित । तभी कष्टदायक भी विहित । करना कर्म ॥ ३१ ॥ अपना विहित-कर्म तजकर । दूसरोंका भला जो अपनाकर । जैसे पैरोंसे चलना छोडकर । चलना सिरसे ॥ ३२ ॥ इसीलिये जो कर्म अपना । स्वभावसे मिला हुवा मान । करनेसे ही कर्म-बंधन । छूटता पार्थ ॥ ३३ ॥ तथा स्वधर्मको पालना । पर-धर्म जान तजना । यह नियम न पालना । उस समय ॥ ३४ ॥

हलका अपना धर्म भला है पर धर्मसे । जलता दोष जो कर्म नियुक्त जो स्वभावसे ॥ ४७ ॥ ७९३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

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