ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब न होता आत्मानुभव । कर्म नहीं छूटता पांडव । उन्हे भोगना दुःख सदैव । मिलता मात्र ॥ ३५ ॥ सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥ प्रत्येक कर्म करते समय प्रारंभमें आयास होते हैं— इसीलिये किसी भी कर्ममें । आयास होते हैं प्रारंभमें । तब कह तू क्या स्वधर्ममें । रहा दोष ॥ ३६ ॥ अजी ! सरल मार्ग चलना । पैरोंका यदि है थक जाना । तो घने जंगलमें घुसना । तब भी वही ॥ ३७ ॥ शिला या साथ लिया पाथेय । एक ही भार है धनंजय । विश्रांतिमें जो सुखका होय । लेना है वही ॥ ३८ ॥ वैसे तो दाना और भूसा । कूटनेमें श्रम एक-सा । पकानेमें श्वानका मांस । तथा हविष्यान्न ॥ ३९ ॥ दधि तथा जलका मंथन । व्यापार जैसा एक समान । बालू तथा तिलोंका पेरना । एक ही जैसा ॥ ९४० ॥ करनेमें नित्यका होम हवन । जलाके आग करना दहन । फूंकके धूम सहना है अर्जुन । एक जैसा ही ॥ ४१ ॥ धर्म-पत्नी या वारांगना । पोसनेमें कष्ट समान । वारांगना रुख करना । अन्याथ क्या दूसरा ॥ ४२ ॥ पीठमें लगके हथियार । आती जब मृत्यु धनुर्धर । तब सम्मुख हो लडकर । करना विक्रम ॥ ४३ ॥ अकुल की मारके भयसे । परगृहमें खाती है वैसे । अपने पतिको तजनेसे । मिला ही क्या अपना ॥ ४४ ॥ सहज प्राप्त जो कर्म न छोडना सदोष भी । दोष हैं सब कर्मोंमें जैसे हैं धूम आगमें ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९५