ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
जब न होता आत्मानुभव । कर्म नहीं छूटता पांडव । उन्हे भोगना दुःख सदैव । मिलता मात्र ॥ ३५ ॥ सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥ प्रत्येक कर्म करते समय प्रारंभमें आयास होते हैं— इसीलिये किसी भी कर्ममें । आयास होते हैं प्रारंभमें । तब कह तू क्या स्वधर्ममें । रहा दोष ॥ ३६ ॥ अजी ! सरल मार्ग चलना । पैरोंका यदि है थक जाना । तो घने जंगलमें घुसना । तब भी वही ॥ ३७ ॥ शिला या साथ लिया पाथेय । एक ही भार है धनंजय । विश्रांतिमें जो सुखका होय । लेना है वही ॥ ३८ ॥ वैसे तो दाना और भूसा । कूटनेमें श्रम एक-सा । पकानेमें श्वानका मांस । तथा हविष्यान्न ॥ ३९ ॥ दधि तथा जलका मंथन । व्यापार जैसा एक समान । बालू तथा तिलोंका पेरना । एक ही जैसा ॥ ९४० ॥ करनेमें नित्यका होम हवन । जलाके आग करना दहन । फूंकके धूम सहना है अर्जुन । एक जैसा ही ॥ ४१ ॥ धर्म-पत्नी या वारांगना । पोसनेमें कष्ट समान । वारांगना रुख करना । अन्याथ क्या दूसरा ॥ ४२ ॥ पीठमें लगके हथियार । आती जब मृत्यु धनुर्धर । तब सम्मुख हो लडकर । करना विक्रम ॥ ४३ ॥ अकुल की मारके भयसे । परगृहमें खाती है वैसे । अपने पतिको तजनेसे । मिला ही क्या अपना ॥ ४४ ॥ सहज प्राप्त जो कर्म न छोडना सदोष भी । दोष हैं सब कर्मोंमें जैसे हैं धूम आगमें ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९५
वैसे कमी कोई कर्म । नहीं होता बिना श्रम । तब है विहित कर्म । करना क्या बुरा ॥ ४५ ॥ लेनेसे जब अल्प अमृत । मिलता है अमर जीवित । तब सर्वस्व देनेमें पार्थ । जाता क्या अपना ॥ ४६ ॥ अजी ! क्यों मूल्य देकर । पीना विष खरीद कर । मरना आत्म-दाह कर । पड़ता है जो ॥ ४७ ॥ वैसे कष्ट देकर इंद्रियोंको । खर्च कर आयुष्यके दिनोंको । और क्या इकट्ठा किया पापको । दुःखके लिये ॥ ४८ ॥ इसलिये पालना स्वधर्म । पालनेसे दूर होते श्रम । तथा उचित देता परम- । पुरुषार्थ राज ॥ ४९ ॥ यह कारण है अर्जुन । स्वधर्मका ही आचरण । संकट समयमें स्मरण । सिद्ध मंत्रका जैसे ॥ ९५० ॥ या नांव जैसे समुद्रमें । दिव्यौषधि महारोगमें । तथा स्वधर्म जगतमें । नहीं भूलना ॥ ५१ ॥ फिर करना कपिध्वजा । स्वकर्मसे ही महापूजा । तुष्ट हो ईश तम रज । करेगा दूर ॥ ५२ ॥ शुद्ध सत्वकी है बाट । तथा अपनी उत्कंठा । भव स्वर्ग कालकूट । दिखांती ऐसे ॥ ५३ ॥ जिस वैराग्यके कहे लक्षण । यही पहले संसिद्धि लक्षण । वहां पहुंचना है विलक्षण । जिस स्थान पर ॥ ५४ ॥ इस भूमिकाको प्राप्त कर । साधक वैसे होता है फिर । सर्वत्र क्या पाना धनुर्धर । कहता हूं अब ॥ ५५ ॥ निर्मल स्नेह पक्व-फलकी भांति अलिप्त होता है— देहादिक है संसारमें । तन ही पड़ा है फंदेमें । फंस भी न आता जालमें । वायु जैसे ॥ ५६ ॥ ७९५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ जैसे आता है पकताका काल । न डांड फल या फल डंटल । न धरता वैसे स्नेह निर्मल । होता है सर्वत्र ॥ ५७ ॥ पुत्र संपदा कलत्र । इससे होता स्वतंत्र । मेरा न कहता पात्र । विषका जैसे ॥ ५८ ॥ रहने दे यह विषय-मात्रसे । बुद्धि मुडती है पीछे चली जैसे । पीछे लौटकर एकांतमें ऐसे । रहती है हृदयमें ॥ ५९ ॥ ऐसे है उसका अंतःकरण । बाहर आनेसे डरता जान । राजाकी सौगंधसे लेके प्रण । न आती दासी जैसे ॥ १६० ॥ इस प्रकार जो चित्त । एकाग्र करके पार्थ । आत्म-चिंतनमें नित । लगाता है ॥ ६१ ॥ दृष्टादृष्ट कामना तब । जैसे नष्ट हो जाती हैं सब । आग राखमें दबती तब । धुंवा नहीं आता ॥ ६२ ॥ मन होता ऐसा अंतर्मुख । इच्छाएं नष्ट होती हैं देख । तब प्राप्त करता साधक । भूमिका ऐसी ॥ ६३ ॥ अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यस्त अवस्था— विपरीत ज्ञान संपूर्ण । नष्ट हो करके अर्जुन । ज्ञानमें ही अंतःकरण । होता है स्थिर ॥ ६४ ॥ संचित जैसे व्ययसे चुकता । वैसे प्राचीन भोगसे मिटता । नया क्रियमाण नहीं होता । किसी कर्मसे ॥ ६५ ॥ ऐसी जो कर्म-समय दशा । वहां बनती है वीरेशा । फिर श्रीगुरु आप ऐसा । मिल जाता है ॥ ६६ ॥ न कहीं रख आसक्ति जीतके मन निःस्पृह । नैष्कर्मकी महासिद्धि पाता संन्यास साधके ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९६
रातके जो चार प्रहर । होते ही मिटाके अंधार । आंखोंको दीखता भास्कर । उसी भांति ॥ ६७ ॥ अथवा आकर फलकी घौंद । करता केलेका बढ़ना बंद । श्रीगुरु मिल साधकको छंद । जगाते हैं मोक्षका ॥ ६८ ॥ चंद्र जो पूर्णिमासे आलिंगित । तजता जैसे सभी व्यंग पार्थ । वैसे उसको मिलती सतत । श्रीगुरुकी कृपा ॥ ६९ ॥ अज्ञान मात्र तब जो रहता । उस कृपासे है सभी मिटता । रजनी सहित है जैसे जाता । अंधार सारा ॥ ९७० ॥ अज्ञानके गर्भमें जैसे । कर्म कर्ता औ' कार्य ऐसे । यह त्रिपुटी रहनेसे । गर्भिणी ही मरी ॥ ७१ ॥ ऐसे अज्ञान नाशके साथ । नष्ट होते हैं सभी क्रिया जात । ऐसे समूल संभव पार्थ । होता संन्यास ॥ ७२ ॥ मूल अज्ञान संन्याससे ऐसे । दृश्यका स्थान ही मिट जानेसे । वहां जानना रहता है ऐसे । आत्मतत्व ॥ ७३ ॥ जगने पर जैसे अर्जुन । डूबे थे ऐसे स्थान । करना पड़ता क्या गमन । बचानेको ॥ ७४ ॥ जो न मैं जानता वह जानूंगा । ऐसा दुष्ट स्वप्न जब मिटेगा । ज्ञाता ज्ञान विरहित जो होगा । चिदाकाश केवल ॥ ७५ ॥ सुखाभास सह वह दर्पण । दूर करनेसे अर्जुन । रहता देखनेके बिन । देखनेवाला जो ॥ ७६ ॥ वैसे न जानना जो गया । साथ जानना भी ले गया । फिर निष्क्रिय रह गया । चिन्मात्रा ही ॥ ७७ ॥ स्वभावसे वहां धनंजय । न रही किसी भांतिकी क्रिया । इसीलिये वह कहा गया । नैष्कर्म्य ऐसा ॥ ७८ ॥ होता है जब वायुका लोप । उससे होता तरंग लोप । तब जैसे रहता है आप । समुद्र मात्र ॥ ७९ ॥ ७९७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऐसे होना जब नहीं घड़ता । वह नैष्कर्म्य सिद्धि है कहाता । सभी सिद्धियोंमें यह जो होता । परम श्रेष्ठ ॥ ९८० ॥ मंदिरके कार्यमें कलश । गंगाकी सीमा सिंधु-प्रवेश । वैसे सुवर्ण-सिद्धिमें कस । सोलहवा अंतिम ॥ ८१ ॥ ऐसे अपना अज्ञान । मिटा देता जो वह ज्ञान । वह भी निगल अर्जुन । रहनेकी दशा ॥ ८२ ॥ इसके पर कुछ नहीं । पाना ऐसे रहता नहीं । इसीलिये कहना यही । परम-सिद्धि ॥ ८३ ॥ किंतु यही जो आत्म-सिद्धि । जैसे है कोई भाग्य-निधि । श्रीगुरुकृपा-उपलब्धि । होती तब मिलती ॥ ८४ ॥ सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौंतेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥ ब्रह्मत्व-सिद्धिका विवेचन— उदय होते ही दिनकर । प्रकाश ही होता है अंधार । अथवा दीप सह् कर्पूर । होता है दीप ॥ ८५ ॥ अथवा लवण-कणिका । मिलकर जैसे उदका । होती है आप भी उदक । उसी प्रकार ॥ ८६ ॥ या निद्रित होता है जागृत । स्वप्न सह् नींद होती व्यर्थ । तथा अपना रूप जागृत । पाना जैसे ॥ ८७ ॥ जिस किसीके सुदैवसे । श्रीगुरु-वाक्य श्रवणसे । द्वैत निगल स्थिरतासे । रहता स्ववृत्तिमें ॥ ८८ ॥ श्रवण वचनका मिलन । होते ही जैसे सुन अर्जुन । स्वयं-स्वरूप हो जाना मान । अपने आपमें ॥ ८९ ॥ मिला है सिद्धिमें ब्रह्म कैसे किस प्रकारसे । ज्ञानकी श्रेष्ठ जो निष्ठा अल्पमें कहता सुन ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९८
उसको फिर कुछ करना । रहता क्या कह अर्जुन । आकाशको आना तथा जाना । रहता है क्या ॥ ९९० ॥ इसीलिये उसको कहीं । त्रिशुद्धि करना है नहीं । न हुवा ऐसे कुछ कहीं । उसके लिये ॥ ९१ ॥ उन्हे स्व-कर्मकी अग्निमें । काम्य निषेध ईंधनमें । रज तमको जलानेमें । करना प्रारंभ ॥ ९२ ॥ पुत्र वित्त तथा परलोक । इन तीनोंका जो अभिलाष । हुवा जैसे अपना सेवक । ऐसे होगा ॥ ९३ ॥ स्वैर इंद्रियोंमें सर्व-स्पर्शसे । आई हुई जिस मलिनतासे । मुक्त करनेमें प्रत्याहारसे । किया जाता स्नान ॥ ९४ ॥ तथा स्वधर्मका जो फल । ईश्वरार्पण करके बल । लेकर किया है गरल । वैषम्यका वह ॥ ९५ ॥ आत्म-साक्षात्कारमें ऐसे । ज्ञानका उत्कर्ष हो कैसे । इसकी सामग्री जो ऐसे । पाता है वह ॥ ९६ ॥ तथा है ऐसे ही समय । सद्गुरु मिले धनंजय । उसने ज्ञान-दान कार्य । सही किया तो भी ॥ ९७ ॥ वैराग्यका लाभ और श्रीगुरुके लोभसे अनुभव-अंकुर फूटता है- औषध लेते ही तत्क्षण । रोगमें आयेगा क्या गुण । या सूर्योदयसे तत्क्षण । मध्यान्ह होगा क्या ॥ ९८ ॥ सुक्षेत्र तथा है जो तर । बोया बीज गला सुंदर । किंतु फल आनेमें देर । लगेगा ही ॥ ९९ ॥ चले मार्ग पर जो सरल । वहां मिला सत्संगका मेल । पहुंचने तक कुछ काल । लगेगा ही ॥ १००० ॥ ऐसे हुवा वैराग्यका लाभ । तथा मिला श्रीगुरुका लोभ । अंतःकरणमें फूटा कोंब । विवेकका ॥ १ ॥ ७९९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
वह ब्रह्म ही एक सत । दूसरा संपूर्ण है भ्रांत । इसको जिसने प्रतीत । किया है दृढ ॥ २ ॥ किंतु वह जो परब्रह्म । सर्वात्मक है सर्वोत्तम । जिससे मोक्षका भी काम । रहता नहीं ॥ ३ ॥ अपनेमें ही यह जो ज्ञान । पचाता तीनो अवस्था जान । उस ज्ञानका भी आलिंगन । करती जो वस्तु ॥ ४ ॥ ऐक्यकी एकता होती समाप्त । आनंद कण भी होता है लुप्त । कुछ न करके रहता नित । जो है कुछ ॥ ५ ॥ उस ब्रह्ममें ही लय होकर । रहना है ब्रह्म ही बनकर । क्रमसे उसको भी प्राप्त कर । लिया है तब ॥ ६ ॥ जैसे है कोई बुभुक्षित । करता षड्रसान्न प्राप्त । तब प्रति ग्राससे तृप्त । होता है वैसे ॥ ७ ॥ मिला वैराग्य-स्नेहका भरण । विवेक दीप कर प्रज्वलन । उसमेंसे आत्म-तत्व निधान । पा लेना है ॥ ८ ॥ भोगना है आत्म-ऋद्धि । इतनी योग्यता सिद्धि । जिसने है निरवधि । पायी भूषण रूप ॥ ९ ॥ जिस क्रमसे वह ब्रह्म । होता जाता यह सुगम । उस क्रमका अब मर्म । कहता हूं सुन ॥ १०१० ॥ बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥ द्वंद्व चिंता छोड़ कर स्व-चिंतन करना शुद्ध-बुद्धि है— श्रीगुरुके दिखाये मार्ग पर । चारु विवेक-तीर्थ तटपर । साधक बुद्धिका मल धोकर । तदुपरांत ॥ ११ ॥ जुड़ाके सात्विकी बुद्धि धृतिकी डोर खींचके । तजके शब्द स्पर्शादि जीतके राग-द्वेषको ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ८००
फिर जो राहुके मुखसे मुक्त । चंद्र-प्रभा चंद्रसे आलिंगित । वैसे शुद्ध बुद्धि करती प्राप्त । अपने ही रूपको ॥ १२ ॥ जैसे दोनों कुलको तजकर । प्रिया प्रियमें रत निरंतर । वैसे द्वंद्व चिंतन तजकर । करती स्वचिंतन ॥ १३ ॥ वैसेही ज्ञान जैसे जीवन । विषयोंमें ले जा अनुदिन । इंद्रियोंसे किये बडे जान । शब्दादिक जो ॥ १४ ॥ दूर होते ही रश्मि जाल । मिट जाता है मृगजल । वैसे ही धृतिसे निर्मल । किये पांचोंही ॥ १५ ॥ खाया हुवा जो अधमान्न । करते हैं जैसे वमन । इंद्रियोंसे ऐसे वासना । सह किया विजय ॥ १६ ॥ आत्माकार वह वृत्ति फिर । लगाके गंगाके तट पर । प्रायश्चित्त किया जो धोकर । शुद्धिकारक ॥ १७ ॥ तब उसने सात्विक दृष्टिसे । विशुद्ध किये हुए इंद्रियोंसे । मन सह योग-धारणासे । लगाई वह ॥ १८ ॥ वैसे ही प्राचीन इष्टानिष्ट । होती है भोगोंसे जब भेंट । आयी हुई कटुतासे रुष्ट । होते नहीं कभी ॥ १९ ॥ या मिले सुंदर विषय । प्रारब्धवश धनंजय । न करते उस समय । अभिलाषा भी ॥ १०२० ॥ ऐसे इष्टानिष्टमें पार्थ । रागद्वेषसे हो रहित । वन गिरि-गुहामें नित । करते वास ॥ २१ ॥ साधनावस्थाका विवेचन— भीड भाड तजकर । वनस्थलमें जाकर । अंगों सह धनुर्धर । रहता आप ॥ २२ ॥ शम-दमादिकोंसे खेलना । सदा मौनसे ही है बोलना । गुरु-वचनोंमें बिताना । समय सारा ॥ २३ ॥ (90) ८०१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोशी
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ शरीरमें बल रहना । अथवा भूखको मिटाना । या जीभके पूर्ण करना । मनोरथ सारे ॥ २४ ॥ करनेमें वह भोजन । नहीं जानता है ये तीन । संतुष्ट होता है अल्पान्न । खाकर ही वह ॥ २५ ॥ आसनकी उष्णतासे । प्राणकी क्षति होनेसे । रहे प्राण जितनेसे । उतनाही खाना ॥ २६ ॥ जैसे पर-पुरुषकी इच्छा मान । न देती कुल-वधु अपना तन । वैसे ही निद्रालस्य दायक अन्न । खाता ही नहीं ॥ २७ ॥ दंडवत जब वह करता । तभी तन भूमिस्पर्श करता । वैसे ही भूमिपे वह नहीं पड़ता । अविचारसे कभी ॥ २८ ॥ शरीर निर्वाह हो अपना । उतने हाथ पैर हिलाना । ऐसे है अंतर्बाह्य अपना । संयम करता ॥ २९ ॥ तथा देख मनका चौखट । वृत्ति नही जाती निकट । वहां वाचाकी जो खटपट । रहती ही कहां ॥ १०३० ॥ ऐसे तन वचन मानस । जीतके सब बाह्य प्रदेश । आधीन करना है आकाश । ध्यानका उसको ॥ ३१ ॥ गुरु-वाक्यसे होता जो जागृत । उस बोधमें देखता निश्चित । दर्पणमें जैसे देखता पार्थ । अपना स्वरूप ॥ ३२ ॥ अपनेको ही है ध्यानस्थ । ध्यान-रूप वृत्तिमें पार्थ । ध्येयत्वसे लेता है नित । ध्यान प्रकार वह ॥ ३३ ॥ ध्यान ध्येय और ध्याता । होते हैं एकरूपता । तब तक पांडुसुता । करना ध्यान ॥ ३४ ॥ वाक् काय मनको जीत एकांत अल्प सेवन । दृढ वैराग्यसे युक्त डूबा जो ध्यान-योगमें ॥ ५२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०२
इसीलिये जो है मुमुक्षु । आत्म-ज्ञानमें होता दक्ष । सदैव वह योग-पक्ष । लेकर रहता ॥ ३५ ॥ अपान रंध्रद्वय । बीचमें धनंजय । उसके जो है मध्य । एडीसे दबाके ॥ ३६ ॥ आकुंचन करना अध । करके तीन ही बंध । होते हैं जो वायुभेद । करना एक ॥ ३७ ॥ कुंडलिनीको जगाकर । अध्यात्मका विकासकर । आधारादिसे भेद कर । सहस्रार तक ॥ ३८ ॥ सहस्रदलका जो मेघ । पीयूष बर्षता सवेग । उसके मूल पर ओघ । ला करके ॥ ३९ ॥ नाचता रहता पुण्य गिरिपर । उस चैतन्य भैरवका खापर । मन-प्राण खिचडीसे भरकर । तदुपरांत ॥ १०४० ॥ योगाभ्यास दृढ होने पर । यह तीनों बंध आगे कर । किया है ध्यान पिछली ओर । ब्रह्म सिद्ध ॥ ४१ ॥ तथा योग और ध्यान । दोनों हो पूर्ण निर्वहन । आत्म-ज्ञानमें हो लीन । सो पहले ही ॥ ४२ ॥ वीतराग सरीखा । जोड़ रखा है सखा । वह सभी भूमिका । करता पार ॥ ४३ ॥ देखना जो है दीखने तक । साथ देना आंखोंको दीपक । तब न दीखेगी कहां तक । वह जो वस्तु ॥ ४४ ॥ ऐसे करता जो मोक्ष प्रवर्तन । ब्रह्ममें चित्त हो जाने तक लीन । साथ रहता है वैराग्य अर्जुन । उसका नाश कैसे ॥ ४५ ॥ इसीलिये है वैराग्य । ज्ञानाभ्यासका सौभाग्य । करके देता जो योग्य । आत्म-लाभ ॥ ४६ ॥ वैराग्यका कवच पहन कर । उससे जैसे वज्रांग बनकर । वह राजयोगके तुरंग पर । होता आरूढ ॥ ४७ ॥ ८०३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
फिर जो दृश्य दृष्टि-पथमें आता । उसमें जो छोटा बड़ा दीखता । उसे मिटाने ध्यान खड्ग धरता । विवेक मुष्टिमें ॥ ४८ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ ब्रह्म प्राप्ति पथके ये शत्रु— ऐसे संसार-रणांगण पर । सूर्यसा जाता चीरता अंधार । मोक्षश्रीका बनने भर्त्तार । निर्भय होके ॥ ४९ ॥ वहां जो रोकने आता । उस वैरीको मारता । उसमें पहला होता । देहाहंकार ॥ १०५० ॥ मार कर वह नहीं छोड़ता । जन्म देकर जीने नहीं देता । पेंचमें डाल कुंठित करता । अस्थि पंजरके ॥ ५१ ॥ देह दुर्ग उसका सहारा । तोड कर लिया धनुर्धरा । तथा बल है यह दूसरा । मारा शत्रू ॥ ५२ ॥ विषयोंका नाम ही सुनकर । बढ़ जाता चौगुनेसे ऊपर । मृतावस्थामें यह धनुर्धर । पहुंचाता विश्वको ॥ ५३ ॥ वह है विषय-विषका गर्त । सब दोषोंका चक्रवर्ती पार्थ । किंतु कैसे ध्यान-खड्गका घात । सहेगा वह ॥ ५४ ॥ प्रिय विषय जब होते प्राप्त । उस सुखको कर अभिव्यक्त । वही आवरण डालके पार्थ । करता है गर्जना ॥ ५५ ॥ सन्मार्गको ही जो भुलाता । अधर्म वनमें फंसाता । बाघके मुखमें है देता । नरकादिक ॥ ५६ ॥ विश्वाससे मारता जो रिपु । निर्मम कर देता है दर्प । जिसके नामसे आता कंप । तपस्वियोंको ॥ ५७ ॥ बल दर्प अहंकार काम क्रोध परिग्रह । छोड़ कर स-ममत्व पाता है ब्रह्म शांतिसे ॥ ५३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०४
क्रोध जैसा है महादोष । जिसका होता परिपाक । भरनेसे होता अधिक । रीता ही जो ॥ ५८ ॥ वह काम जिस स्थान पर । नष्ट होता उस स्थान पर । क्रोध भी सहज धनुर्धर । होता है नष्ट ॥ ५९ ॥ जड़ ही तोड़नेसे जैसे । शाखायें नष्ट होती वैसे । वैसे ही कामके नाशसे । नासता है क्रोध ॥ १०६० ॥ इसीलिये वैरी है जो काम । उसीका मिटाया जब नाम । मिटता जैसे गमनागम । क्रोधका भी ॥ ६१ ॥ जैसे अपना अड़गोड़ा समर्थ । अपराधीके सिरपे होता पार्थ । वैसे भोग देकर होता समर्थ । परिग्रह ॥ ६२ ॥ वैसे ही खुगीर सिरपे देता । अंगांगमें अवगुण भरता । जीवके हाथमें लकड़ी देता । ममत्वकी जो ॥ ६३ ॥ शिष्य-शाखादि विलाससे । मठ मुद्रादि बहानेसे । डाले हैं जो इसने फांसे । असंगों पर भी ॥ ६४ ॥ घरमें कुटुंब रूपसे रहता । वनमें वन्य बन अवतरता । नग्न शरीरको भी चिपकता । पांडुकुमार ॥ ६५ ॥ अपरिग्रह जो ऐसा दुर्जय । उसपे भी पाकर विजय । भव विजयका धनंजय । आता उत्साह ॥ ६६ ॥ अमानित्वादि जो संपूर्ण । ज्ञानके होते सभी गुण । वैफल्य देशके प्रधान । होते हैं जैसे ॥ ६७ ॥ सम्यग्ज्ञानका राज्य अर्पण । करके वे सभी गुणगण । उसके परिवार भूषण । होके रहते हैं ॥ ६८ ॥ तब प्रवृत्तिके राज-पथमें । अवस्था-भेद प्रमदियां आपमें । दीठ उतारती प्रति-पगमें । अपने सुखकी ॥ ६९ ॥ बोधके दंडसे विवेक जब । दृश्योंकी भीड हटाता सब । योगकी भूमिका आके तब । आरती उतारती ॥ १०७० ॥ ८०५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तब ऋद्धि सिद्धिके समुदाय । आते रहते समय समय । उस पुष्प-वृष्टिसे धनंजय । नहाता रहता वह ॥ ७१ ॥ इस भांति ब्रह्मैक्यके समान । स्वराज्य आता है समीप जान । आनंदसे तीनों लोक अर्जुन । भर देता है ॥ ७२ ॥ शत्रु-मित्रभाव तब अर्जुन । नहीं रहता साम्यके कारण । न होता द्वंद्व अणु समान । उस समय ॥ ७३ ॥ यही नहीं किसी कारणसे । कभी कहें यह मेरा ऐसे । इतना द्वैत भी प्रतीतिसे । न जानता वह ॥ ७४ ॥ एक मात्र तब अपनी सत्ता । विश्व-व्यापी करके पांडुसुता । पास फटकने न देता ममता । इतना भी वह ॥ ७५ ॥ जीतकर ऐसा रिपुवर्ग । आप बन गया सारा जग । तब होगया तुरंत योग । वहां सुदृढ ॥ ७६ ॥ अपने पथके शत्रुओंको जीतनेके बाद— फिर वैराग्यका आवरण । तनपे दृढ था जो अर्जुन । करता शिथिल कुछ क्षण । उस समय ॥ ७७ ॥ चलाने ध्यानकी जो तलवार । सम्मुख नहीं द्वैत धनुर्धर । तब होता है ध्यानका भी कर । कुछ शिथिल ॥ ७८ ॥ अथवा रसौषधि जैसे । अपना काम हो जानेसे । आप ही न रहती वैसे । उसी प्रकार ॥ ७९ ॥ जैसे है जहां पहुंचना होता । वह स्थान देख पैर रुकता । वैसे ब्रह्म-दर्शनसे होता । अभ्यास शिथिल ॥ १०८० ॥ जैसे सिंधुसे संपर्क आता । गंगाका वेग भी उतरता । या पतिसे मिलके स्थिरता । आती कामिनीमें ॥ ८१ ॥ अथवा आता है जब फल । बढ़ न सकता जब केल । या गांव आते जैसे केवल । रुकता मार्ग ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०६
वैसे ही आत्म-साक्षात्कार । होता है यह देख कर । साधनाका जो हथियार । रखता नीचे ॥ ८३ ॥ इसीलिये ब्रह्मसे उसका । समय आने पर ऐक्यका । शिथिल होता है साधनोंका । वेग पार्थ ॥ ८४ ॥ वैराग्यका फिर है तिरोधान । नानाभ्यासका वार्धक्य अर्जुन । योग फलका परिपाक जान । दशा है जो ॥ ८५ ॥ तब वह शांति मान पांडुसुता । उसके अंगांगमें आती पूर्णता । ब्रह्मत्व पाके योग्य है वह होता । पुण्य-पुरुष ॥ ८६ ॥ पूर्णिमासे जैसे चतुर्दशी । अल्पत्वमें रहता है शशी । या सोलहवे कससे जैसे । पंद्रह होता अल्प ॥ ८७ ॥ सागरमें जाता पानी वेगसे । वह होता गंगौघका जैसे । तथा जो निश्चलतासे । रहता सिंधुका ॥ ८८ ॥ ब्रह्म या ब्रह्मत्वके निकट । व्यक्ति होता उसमें सुभट । ऐसा अंतर जो वह काट । पाता ब्रह्मत्व ॥ ८९ ॥ परंतु ऐसे हुए बिन । प्रतीत होता ब्रह्मपन । वही ब्रह्म होनेकी जान । योग्यता है वहां ॥ १०९० ॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥ वह ब्रह्म-भाव योग्यता । पुरुष फिर पांडुसुता । आत्म-बोधकी प्रसन्नता । पद पाता है ॥ ९१ ॥ जिस तापसे होता है पाक । वह जाता पकनेपे पाक । फिर जैसे आह्लाद कारक । होता है वह ॥ ९२ ॥ अनेक प्रवाह जैसे लगभग । शरत्कालमें तजते है गंग । अथवा गीत होनेपे उपांग । रुकते जैसे ॥ ९३ ॥ हुवा ब्रह्म प्रसन्नात्मा कामना शोकके बिन । पाता मेरी परा भक्ति देखती साम्य जो कहीं ॥ ५४ ॥ ८०७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आत्म-बोधमें ऐसा उद्यम । करते हुए होता है श्रम । उसका भी हो जाता है शम । जिस स्थानपे ॥ ९४ ॥ आत्म-बोध प्रसन्नता । कहलाती वह पार्थ ! । उसका है भोग लेता । योग-साधक ॥ ९५ ॥ ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन— उस स्थितिमें शोक करना । किसी वस्तुकी इच्छा करना । डूबती यह सब भावना । साम्य-पूरमें ॥ ९६ ॥ उदय होते ही गभस्ति । नक्षत्र-मंडलकी व्यक्ति । लोपती है उसकी दीप्ति । जिस प्रकार ॥ ९७ ॥ उदय होते ही आत्म-प्रभा । जो सारी भूत भेद व्यवस्था । तोड़ते हुए वह देखता । अपनारूप ॥ ९८ ॥ पाटी पे लिखे अक्षर । जैसे पोंछते हैं कर । वैसे खोते भेदांतर । उसकी दृष्टिमें ॥ ९९ ॥ वैसे ही जो अन्यथा ज्ञान । दिखाता जागृति स्वप्न । वे दोनों क्रियायें हैं लीन । अज्ञानमें ॥ ११०० ॥ फिर वह भी अज्ञान । बोध बढते ही लीन । उस बोधमें संपूर्ण । डूबता है ॥ १ ॥ जैसे भोजनके समय । क्षुधा क्षीणती धनंजय । वैसे ही तृप्तिके समय । होती है अस्त ॥ २ ॥ जैसे वेग बढ़ता जाता । वैसे मार्ग घटता जाता । फिर जब गंतव्य आता । डूबता मार्ग ॥ ३ ॥ या जागृतिका होता उदीपन । निद्रा क्षीण होते जाती अर्जुन वैसे ही पूर्ण जागृतिमें मान । निद्राका अंत ॥ ४ ॥ या अपना पूर्णत्व मिलता । चंद्रका बढ़ना ही मिटता । शुक्ल-पक्षका भी अंत आता । तब निःशेष ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०८
जैसे सभी पदार्थ-ज्ञान । निगल जाता मेरा ज्ञान । तब वह संपूर्ण ज्ञान । अज्ञान निगलता ॥ ६ ॥ जैसे कल्पांतके समय । नदी सिंधुके समुदाय । एक होकर धनंजय । जल होता आम्रक्ष ॥ ७ ॥ या मिटकर नाना घटाकाश । एक हो जाता है महदाकाश । या काष्ठोंसे जलके काष्ठ शेष । रहता है अग्नि ॥ ८ ॥ अथवा भूषणके आकार । आंचमें सभी पिघलकर । सारा नाम रूप मिटाकर । होता है सुवर्ण ॥ ९ ॥ अथवा होते ही जागृत । हो जाता है स्वप्नका अस्त । फिर जैसे आपही पार्थ । रह जाता है ॥ १११० ॥ वैसे ही मुझ एकको छोडकर । न उसे अपने सह कुछ और । कहाती जो चौथी भक्ति धनुर्धर । पाता है वह ॥ ११ ॥ जहां आर्त जिज्ञासू अर्थार्थी । जिस मार्गसे करते भक्ति । इसे देख मैं कहता चौथी । भक्ति इसको ॥ १२ ॥ वैसे नहीं पहली या चौथी । दूसरी तीसरी इस भांति । किंतु जो मेरी सहज स्थिति । भक्ति नाम उसका ॥ १३ ॥ मेरे अज्ञानका प्रकाशन । दिखाके मेरा अन्यथा ज्ञान । सबको सर्वत्र ही भजन- । सुझाती है ॥ १४ ॥ जहां जो जैसे देखता वैसे । उसे वहां रहता है वैसे । दीखता मेरे चित्प्रकाशसे । यह अखंड ॥ १५ ॥ स्वप्नका दीखना या न दीखना । अपने अस्तित्वपे होना जाना । जिससे विश्वका होना या न होना । प्रकाशना वैसे ॥ १६ ॥ ऐसा यह मेरा सहज । प्रकाश जो है कपिध्वज । वह भक्ति नामसे आज । कहा जाता है ॥ १७ ॥ इसीलिये आर्तोंमें जैसे । बनके उत्कट इच्छासे । अपेक्षणीय जो है उसे । भाता मैं ही ॥ १८ ॥ ८०९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जिज्ञासूके सन्मुख वीरेशा । इसी भांति होकर जिज्ञासा । मैं ही मानो जिज्ञास्यु है ऐसा । दिखाया गया है ॥ १९ ॥ ऐसे ही बनकर अर्थना । मैं ही मेरे अर्थार्थ अर्जुना । करके तब अर्थाभिधाना । लाता मुझको ही ॥ ११२० ॥ ऐसे ही अज्ञानका कर स्वीकार । करते भक्तिमें मेरा व्यवहार । दिखाती भक्ति दृश्य-रूप लेकर । मुझ द्रष्टाको ही ॥ २१ ॥ मुखको दीखता वहां मुख । इस बोलनेमें नहीं चूक । झूठा द्वैत दिखाता है देख । दर्पण यहां ॥ २२ ॥ चंद्रको ही देखते हैं नेत्र । तिमिर करता यही मात्र । दिखाता रहता है सर्वत्र । एकका होकर ॥ २३ ॥ सर्वत्र ऐसे मुझको मैं अर्जुन । भक्तिसे होता रहता आकलन । किंतु है दृश्यत्व अज्ञान कारण । व्यर्थका यहां ॥ २४ ॥ मिटा अब वह सब अज्ञान । मेरा द्रष्टृत्व मुझे मिला मान । निज-बिंबमें हुवा है विलीन । प्रतिबिंब जैसे ॥ २५ ॥ सोनेमें जब मिला रहता मल । तब भी सोना रहता है अचल । किंतु जल करके वह केवल । रहता सोना ही ॥ २६ ॥ अजी ! पूर्णमासिके पहले कहीं । चंद्रमा सावयव होता या नहीं । पूर्णचंद्र देखने मिलता यहीं । पूर्णमासीको ॥ २७ ॥ वैसे मैं अन्यथा ज्ञानसे । दीखता हूं भिन्न रूपसे । वह द्रष्टत्वमें खोनेसे । मुझे मैं भेटता ॥ २८ ॥ तभी दृश्यपथातीत । मेरा यह पांडुसुत । भक्तियोग है चतुर्थ । कहा मैंने ॥ २९ ॥ ज्ञान-भक्तिसे जो सहजरूप । भक्त मुझमें लीन हुवा आप । वह केवल मैं हूं परंतप । जानता तू यह ॥ ११३० ॥ जो मैं हुवा नहीं उसके लिये मैं है ही नहीं— मैंने ही हाथ उठाकर । ज्ञानी भक्त जो धनुर्धर । मेरा आत्मा इस प्रकार । कहा सातवेमें ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१०
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥ भक्ति जो कल्पादिमें मुझसे । उपदेश रूप जो ब्रह्मसे । कही गयी है उत्तम ऐसे । भागवतद्वारा ॥ ३२ ॥ ज्ञानी इसको स्व-संवित्ति । शैव कहते इसे शक्ति । तथा हम परम-भक्ति । कहते अपनी ॥ ३३ ॥ मुझसे मिलते हुए यह भक्ति । उस श्रमयोगियोंको है फलती । फिर समस्त विश्वको ही देखती । मेरे ही रूपमें ॥ ३४ ॥ वहां वैराग्य विवेकके साथ । मिटता है बंध मोक्ष समस्त । डूबती वृत्ति ध्यान सह पार्थ । उस समय ॥ ३५ ॥ चारों तत्त्वोंको निगलकर । रहता आकार मात्र धनुर्धर । नहीं रहता उसका ओर छोर । कल्पांतमें जैसे ॥ ३६ ॥ उस भांति होकर कूटस्थ । शुद्ध मैं साध्य साधनातीत । वह बनकर मुझे पार्थ । भोगता है ॥ ३७ ॥ बनकर सिंधुका अंग । सिंधुपे झलकती गंग । ऐसे रूपका उसका भोग । सुन तू यह ॥ ३८ ॥ या दर्पणको ही दर्पण । दिखाया मान तू अर्जुन । बढ़ता तब दृष्टापन । वैसे इस भोगमें ॥ ३९ ॥ जागृतका जब स्वप्न नाशता । अपना ही तब ऐक्य दीखता । जैसे जागृतिका ऐक्य भोगता । बिनाद्वैतके ॥ ११४० ॥ जाने दो जब दर्पण खोता । तब मुख-बोध भी ले जाता । मुख-सौंदर्य आप भोगता । अकेला जैसे ॥ ४१ ॥ वही होनेसे भोग उसका । न होता यह भाव जिसका । शब्दसे कैसे करें शब्दका । कह तू उच्चार ॥ ४२ ॥
भक्तिसे तत्त्वता जान कौन मैं कितना रहा । इस भांति मुझे जान मुझमें मिलते फिर ॥ ५५ ॥ ८११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.
किसके गांवमें दीपकसे । सूर्यको उजाला जाता कैसे । व्योमके लिये मांडव कैसे । उभारते न जाने ॥ ४३ ॥ अपनेमें नहीं जब राजपन । भोगेगा कैसा जी राजा राजपन । या अंधार करेगा आलिंगन । सूर्यसे कैसे ॥ ४४ ॥ अथवा जो नहीं है आकाश । वह जानेगा कैसे आकाश । गूंणचीका गहना विशेष । सोहेगा क्या रत्नोमें ॥ ४५ ॥ इसीलिये जो मैं हुवा नहीं । उसके लिये मैं है ही नहीं । फिर भजेगा कैसे जो कोई । कह तू मुझसे ॥ ४६ ॥ अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता किंतु भक्ति होती है— इसी लिये है वह क्रमयोगी । मैं बनकर मेरा भोगी । तारुण्य भोगती है तरुणांगी । उसी प्रकार ॥ ४७ ॥ तोय करता सर्वांगसे यदि चुंबन । प्रभा सर्वत्र विलसती है बिंब मान । नाना आकाश नभमें होकर विलीन । भोगते हैं जैसे ॥ ४८ ॥ वैसे है जो मेरा ही रूप होकर । अक्रिय भजता मुझे निरंतर । भोगता रहता जैसे अलंकार । स्वर्णको ही ॥ ४९ ॥ चंदनकी सुगंध जैसे । चंदन भोगती आपसे । या स्वाभाविक चंद्र जैसे । चंद्रिकाको ॥ ११५० ॥ ऐसे वह क्रिया नहीं सहता । अद्वैतमें भक्ति होती है पार्था । यह अनुभवसे जाना जाता । तोलनेसे नहीं ॥ ५१ ॥ तब पूर्व संस्कारके कारण । जो कुछ होता है यह भाषण । वह विनय सुन मैं अर्जुन । बोलता हूं ॥ ५२ ॥ शब्दको शब्द ही जब मिलता । बोलका व्यवहार नहीं होता । तब है मौन ही स्तवन होता । सुंदर मेरा ॥ ५३ ॥ इसीलिये जब वह बोलता । बोलने वालेसे मैं हूं मिलता । तब मौनसे ही वह तत्वता । स्तवता मुझको ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१२
वैसे ही बुद्धि हो अथवा दृष्टि । जिसे देखना चाहती किरीटी । उस दृष्टिको ही हराके दृष्टि । दिखाती अपनेको ॥ ५५ ॥ दर्पणके पहले अपना मुख । देखनेवाला ही देखता देख । उसीको दर्पणमें वही देख - । सकता है जैसे ॥ ५६ ॥ वैसे दृश्य मिटकर द्रष्टा । जैसे मिलता द्रष्टासे द्रष्टा । वैसे अकेलेमें नहीं मिटा । द्रष्टापन कभी ॥ ५७ ॥ जैसे स्वप्नकी प्रियाको मान । जगके करना आलिंगन । रहता है आपही अर्जुन । प्रियाप्रिय मिलके ॥ ५८ ॥ या दो लकड़ियोंका घर्षण । उससे उठता अग्निकण । दोकी भाषा मिटाके अर्जुन । रहता वह एक ॥ ५९ ॥ क्रमयोगी सदैव मुझे भोगता रहता है— करमें ले अनेक प्रतिबिंब । लेके चलता जब सूर्यबिंब । प्रतिबिंबके साथही बिंब । न होता बिंबत्व ॥ ११६० ॥ वैसा मैं होकर देखता । वह दृश्यको ही ले जाता । वहां दृश्य भी नहीं होता । द्रष्टापन भी ॥ ६१ ॥ रवि अंधार प्रकाशता । न होती जैसे प्रकाश्यता । वैसे दृश्यमें द्रष्टा । मैं होनेसे ॥ ६२ ॥ फिर देखना या न देखना । ऐसी दशाको अनुभवना । यह है जो वास्तविक होना । दर्शन मेरा ॥ ६३ ॥ जो कुछ वह देखता । द्रष्टा दृश्यातीत हो पार्था । इस दृष्टिसे है भोगता । क्रमयोगी सदा ॥ ६४ ॥ तथा आकाश आकाशसे जैसे । भरकर नहीं हिलता वैसे । मैं आत्मासे अपनेमें भी वैसे । होता है उसको ॥ ६५ ॥ कल्पांतमें उदकसे उदक । रोकनेसे सबही जैसे देख । रुक जाता वैसे आत्मासे एक । भर जाता वह ॥ ६६ ॥ पैर अपने पर कैसे चढेगा । अग्नि अपनेको कैसे जलायेगा । पानी आपही कैसे स्नान करेगा । अपनेसेही ॥ ६७ ॥ ८१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'