ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रोध जैसा है महादोष । जिसका होता परिपाक । भरनेसे होता अधिक । रीता ही जो ॥ ५८ ॥ वह काम जिस स्थान पर । नष्ट होता उस स्थान पर । क्रोध भी सहज धनुर्धर । होता है नष्ट ॥ ५९ ॥ जड़ ही तोड़नेसे जैसे । शाखायें नष्ट होती वैसे । वैसे ही कामके नाशसे । नासता है क्रोध ॥ १०६० ॥ इसीलिये वैरी है जो काम । उसीका मिटाया जब नाम । मिटता जैसे गमनागम । क्रोधका भी ॥ ६१ ॥ जैसे अपना अड़गोड़ा समर्थ । अपराधीके सिरपे होता पार्थ । वैसे भोग देकर होता समर्थ । परिग्रह ॥ ६२ ॥ वैसे ही खुगीर सिरपे देता । अंगांगमें अवगुण भरता । जीवके हाथमें लकड़ी देता । ममत्वकी जो ॥ ६३ ॥ शिष्य-शाखादि विलाससे । मठ मुद्रादि बहानेसे । डाले हैं जो इसने फांसे । असंगों पर भी ॥ ६४ ॥ घरमें कुटुंब रूपसे रहता । वनमें वन्य बन अवतरता । नग्न शरीरको भी चिपकता । पांडुकुमार ॥ ६५ ॥ अपरिग्रह जो ऐसा दुर्जय । उसपे भी पाकर विजय । भव विजयका धनंजय । आता उत्साह ॥ ६६ ॥ अमानित्वादि जो संपूर्ण । ज्ञानके होते सभी गुण । वैफल्य देशके प्रधान । होते हैं जैसे ॥ ६७ ॥ सम्यग्ज्ञानका राज्य अर्पण । करके वे सभी गुणगण । उसके परिवार भूषण । होके रहते हैं ॥ ६८ ॥ तब प्रवृत्तिके राज-पथमें । अवस्था-भेद प्रमदियां आपमें । दीठ उतारती प्रति-पगमें । अपने सुखकी ॥ ६९ ॥ बोधके दंडसे विवेक जब । दृश्योंकी भीड हटाता सब । योगकी भूमिका आके तब । आरती उतारती ॥ १०७० ॥ ८०५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग