भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 876

फिर जो दृश्य दृष्टि-पथमें आता । उसमें जो छोटा बड़ा दीखता । उसे मिटाने ध्यान खड्ग धरता । विवेक मुष्टिमें ॥ ४८ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ ब्रह्म प्राप्ति पथके ये शत्रु— ऐसे संसार-रणांगण पर । सूर्यसा जाता चीरता अंधार । मोक्षश्रीका बनने भर्त्तार । निर्भय होके ॥ ४९ ॥ वहां जो रोकने आता । उस वैरीको मारता । उसमें पहला होता । देहाहंकार ॥ १०५० ॥ मार कर वह नहीं छोड़ता । जन्म देकर जीने नहीं देता । पेंचमें डाल कुंठित करता । अस्थि पंजरके ॥ ५१ ॥ देह दुर्ग उसका सहारा । तोड कर लिया धनुर्धरा । तथा बल है यह दूसरा । मारा शत्रू ॥ ५२ ॥ विषयोंका नाम ही सुनकर । बढ़ जाता चौगुनेसे ऊपर । मृतावस्थामें यह धनुर्धर । पहुंचाता विश्वको ॥ ५३ ॥ वह है विषय-विषका गर्त । सब दोषोंका चक्रवर्ती पार्थ । किंतु कैसे ध्यान-खड्गका घात । सहेगा वह ॥ ५४ ॥ प्रिय विषय जब होते प्राप्त । उस सुखको कर अभिव्यक्त । वही आवरण डालके पार्थ । करता है गर्जना ॥ ५५ ॥ सन्मार्गको ही जो भुलाता । अधर्म वनमें फंसाता । बाघके मुखमें है देता । नरकादिक ॥ ५६ ॥ विश्वाससे मारता जो रिपु । निर्मम कर देता है दर्प । जिसके नामसे आता कंप । तपस्वियोंको ॥ ५७ ॥ बल दर्प अहंकार काम क्रोध परिग्रह । छोड़ कर स-ममत्व पाता है ब्रह्म शांतिसे ॥ ५३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०४