ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये जो है मुमुक्षु । आत्म-ज्ञानमें होता दक्ष । सदैव वह योग-पक्ष । लेकर रहता ॥ ३५ ॥ अपान रंध्रद्वय । बीचमें धनंजय । उसके जो है मध्य । एडीसे दबाके ॥ ३६ ॥ आकुंचन करना अध । करके तीन ही बंध । होते हैं जो वायुभेद । करना एक ॥ ३७ ॥ कुंडलिनीको जगाकर । अध्यात्मका विकासकर । आधारादिसे भेद कर । सहस्रार तक ॥ ३८ ॥ सहस्रदलका जो मेघ । पीयूष बर्षता सवेग । उसके मूल पर ओघ । ला करके ॥ ३९ ॥ नाचता रहता पुण्य गिरिपर । उस चैतन्य भैरवका खापर । मन-प्राण खिचडीसे भरकर । तदुपरांत ॥ १०४० ॥ योगाभ्यास दृढ होने पर । यह तीनों बंध आगे कर । किया है ध्यान पिछली ओर । ब्रह्म सिद्ध ॥ ४१ ॥ तथा योग और ध्यान । दोनों हो पूर्ण निर्वहन । आत्म-ज्ञानमें हो लीन । सो पहले ही ॥ ४२ ॥ वीतराग सरीखा । जोड़ रखा है सखा । वह सभी भूमिका । करता पार ॥ ४३ ॥ देखना जो है दीखने तक । साथ देना आंखोंको दीपक । तब न दीखेगी कहां तक । वह जो वस्तु ॥ ४४ ॥ ऐसे करता जो मोक्ष प्रवर्तन । ब्रह्ममें चित्त हो जाने तक लीन । साथ रहता है वैराग्य अर्जुन । उसका नाश कैसे ॥ ४५ ॥ इसीलिये है वैराग्य । ज्ञानाभ्यासका सौभाग्य । करके देता जो योग्य । आत्म-लाभ ॥ ४६ ॥ वैराग्यका कवच पहन कर । उससे जैसे वज्रांग बनकर । वह राजयोगके तुरंग पर । होता आरूढ ॥ ४७ ॥ ८०३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग