ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ शरीरमें बल रहना । अथवा भूखको मिटाना । या जीभके पूर्ण करना । मनोरथ सारे ॥ २४ ॥ करनेमें वह भोजन । नहीं जानता है ये तीन । संतुष्ट होता है अल्पान्न । खाकर ही वह ॥ २५ ॥ आसनकी उष्णतासे । प्राणकी क्षति होनेसे । रहे प्राण जितनेसे । उतनाही खाना ॥ २६ ॥ जैसे पर-पुरुषकी इच्छा मान । न देती कुल-वधु अपना तन । वैसे ही निद्रालस्य दायक अन्न । खाता ही नहीं ॥ २७ ॥ दंडवत जब वह करता । तभी तन भूमिस्पर्श करता । वैसे ही भूमिपे वह नहीं पड़ता । अविचारसे कभी ॥ २८ ॥ शरीर निर्वाह हो अपना । उतने हाथ पैर हिलाना । ऐसे है अंतर्बाह्य अपना । संयम करता ॥ २९ ॥ तथा देख मनका चौखट । वृत्ति नही जाती निकट । वहां वाचाकी जो खटपट । रहती ही कहां ॥ १०३० ॥ ऐसे तन वचन मानस । जीतके सब बाह्य प्रदेश । आधीन करना है आकाश । ध्यानका उसको ॥ ३१ ॥ गुरु-वाक्यसे होता जो जागृत । उस बोधमें देखता निश्चित । दर्पणमें जैसे देखता पार्थ । अपना स्वरूप ॥ ३२ ॥ अपनेको ही है ध्यानस्थ । ध्यान-रूप वृत्तिमें पार्थ । ध्येयत्वसे लेता है नित । ध्यान प्रकार वह ॥ ३३ ॥ ध्यान ध्येय और ध्याता । होते हैं एकरूपता । तब तक पांडुसुता । करना ध्यान ॥ ३४ ॥ वाक् काय मनको जीत एकांत अल्प सेवन । दृढ वैराग्यसे युक्त डूबा जो ध्यान-योगमें ॥ ५२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०२