ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर जो राहुके मुखसे मुक्त । चंद्र-प्रभा चंद्रसे आलिंगित । वैसे शुद्ध बुद्धि करती प्राप्त । अपने ही रूपको ॥ १२ ॥ जैसे दोनों कुलको तजकर । प्रिया प्रियमें रत निरंतर । वैसे द्वंद्व चिंतन तजकर । करती स्वचिंतन ॥ १३ ॥ वैसेही ज्ञान जैसे जीवन । विषयोंमें ले जा अनुदिन । इंद्रियोंसे किये बडे जान । शब्दादिक जो ॥ १४ ॥ दूर होते ही रश्मि जाल । मिट जाता है मृगजल । वैसे ही धृतिसे निर्मल । किये पांचोंही ॥ १५ ॥ खाया हुवा जो अधमान्न । करते हैं जैसे वमन । इंद्रियोंसे ऐसे वासना । सह किया विजय ॥ १६ ॥ आत्माकार वह वृत्ति फिर । लगाके गंगाके तट पर । प्रायश्चित्त किया जो धोकर । शुद्धिकारक ॥ १७ ॥ तब उसने सात्विक दृष्टिसे । विशुद्ध किये हुए इंद्रियोंसे । मन सह योग-धारणासे । लगाई वह ॥ १८ ॥ वैसे ही प्राचीन इष्टानिष्ट । होती है भोगोंसे जब भेंट । आयी हुई कटुतासे रुष्ट । होते नहीं कभी ॥ १९ ॥ या मिले सुंदर विषय । प्रारब्धवश धनंजय । न करते उस समय । अभिलाषा भी ॥ १०२० ॥ ऐसे इष्टानिष्टमें पार्थ । रागद्वेषसे हो रहित । वन गिरि-गुहामें नित । करते वास ॥ २१ ॥ साधनावस्थाका विवेचन— भीड भाड तजकर । वनस्थलमें जाकर । अंगों सह धनुर्धर । रहता आप ॥ २२ ॥ शम-दमादिकोंसे खेलना । सदा मौनसे ही है बोलना । गुरु-वचनोंमें बिताना । समय सारा ॥ २३ ॥ (90) ८०१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोशी