ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
फिर जो राहुके मुखसे मुक्त । चंद्र-प्रभा चंद्रसे आलिंगित । वैसे शुद्ध बुद्धि करती प्राप्त । अपने ही रूपको ॥ १२ ॥ जैसे दोनों कुलको तजकर । प्रिया प्रियमें रत निरंतर । वैसे द्वंद्व चिंतन तजकर । करती स्वचिंतन ॥ १३ ॥ वैसेही ज्ञान जैसे जीवन । विषयोंमें ले जा अनुदिन । इंद्रियोंसे किये बडे जान । शब्दादिक जो ॥ १४ ॥ दूर होते ही रश्मि जाल । मिट जाता है मृगजल । वैसे ही धृतिसे निर्मल । किये पांचोंही ॥ १५ ॥ खाया हुवा जो अधमान्न । करते हैं जैसे वमन । इंद्रियोंसे ऐसे वासना । सह किया विजय ॥ १६ ॥ आत्माकार वह वृत्ति फिर । लगाके गंगाके तट पर । प्रायश्चित्त किया जो धोकर । शुद्धिकारक ॥ १७ ॥ तब उसने सात्विक दृष्टिसे । विशुद्ध किये हुए इंद्रियोंसे । मन सह योग-धारणासे । लगाई वह ॥ १८ ॥ वैसे ही प्राचीन इष्टानिष्ट । होती है भोगोंसे जब भेंट । आयी हुई कटुतासे रुष्ट । होते नहीं कभी ॥ १९ ॥ या मिले सुंदर विषय । प्रारब्धवश धनंजय । न करते उस समय । अभिलाषा भी ॥ १०२० ॥ ऐसे इष्टानिष्टमें पार्थ । रागद्वेषसे हो रहित । वन गिरि-गुहामें नित । करते वास ॥ २१ ॥ साधनावस्थाका विवेचन— भीड भाड तजकर । वनस्थलमें जाकर । अंगों सह धनुर्धर । रहता आप ॥ २२ ॥ शम-दमादिकोंसे खेलना । सदा मौनसे ही है बोलना । गुरु-वचनोंमें बिताना । समय सारा ॥ २३ ॥ (90) ८०१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोशी
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ शरीरमें बल रहना । अथवा भूखको मिटाना । या जीभके पूर्ण करना । मनोरथ सारे ॥ २४ ॥ करनेमें वह भोजन । नहीं जानता है ये तीन । संतुष्ट होता है अल्पान्न । खाकर ही वह ॥ २५ ॥ आसनकी उष्णतासे । प्राणकी क्षति होनेसे । रहे प्राण जितनेसे । उतनाही खाना ॥ २६ ॥ जैसे पर-पुरुषकी इच्छा मान । न देती कुल-वधु अपना तन । वैसे ही निद्रालस्य दायक अन्न । खाता ही नहीं ॥ २७ ॥ दंडवत जब वह करता । तभी तन भूमिस्पर्श करता । वैसे ही भूमिपे वह नहीं पड़ता । अविचारसे कभी ॥ २८ ॥ शरीर निर्वाह हो अपना । उतने हाथ पैर हिलाना । ऐसे है अंतर्बाह्य अपना । संयम करता ॥ २९ ॥ तथा देख मनका चौखट । वृत्ति नही जाती निकट । वहां वाचाकी जो खटपट । रहती ही कहां ॥ १०३० ॥ ऐसे तन वचन मानस । जीतके सब बाह्य प्रदेश । आधीन करना है आकाश । ध्यानका उसको ॥ ३१ ॥ गुरु-वाक्यसे होता जो जागृत । उस बोधमें देखता निश्चित । दर्पणमें जैसे देखता पार्थ । अपना स्वरूप ॥ ३२ ॥ अपनेको ही है ध्यानस्थ । ध्यान-रूप वृत्तिमें पार्थ । ध्येयत्वसे लेता है नित । ध्यान प्रकार वह ॥ ३३ ॥ ध्यान ध्येय और ध्याता । होते हैं एकरूपता । तब तक पांडुसुता । करना ध्यान ॥ ३४ ॥ वाक् काय मनको जीत एकांत अल्प सेवन । दृढ वैराग्यसे युक्त डूबा जो ध्यान-योगमें ॥ ५२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०२
इसीलिये जो है मुमुक्षु । आत्म-ज्ञानमें होता दक्ष । सदैव वह योग-पक्ष । लेकर रहता ॥ ३५ ॥ अपान रंध्रद्वय । बीचमें धनंजय । उसके जो है मध्य । एडीसे दबाके ॥ ३६ ॥ आकुंचन करना अध । करके तीन ही बंध । होते हैं जो वायुभेद । करना एक ॥ ३७ ॥ कुंडलिनीको जगाकर । अध्यात्मका विकासकर । आधारादिसे भेद कर । सहस्रार तक ॥ ३८ ॥ सहस्रदलका जो मेघ । पीयूष बर्षता सवेग । उसके मूल पर ओघ । ला करके ॥ ३९ ॥ नाचता रहता पुण्य गिरिपर । उस चैतन्य भैरवका खापर । मन-प्राण खिचडीसे भरकर । तदुपरांत ॥ १०४० ॥ योगाभ्यास दृढ होने पर । यह तीनों बंध आगे कर । किया है ध्यान पिछली ओर । ब्रह्म सिद्ध ॥ ४१ ॥ तथा योग और ध्यान । दोनों हो पूर्ण निर्वहन । आत्म-ज्ञानमें हो लीन । सो पहले ही ॥ ४२ ॥ वीतराग सरीखा । जोड़ रखा है सखा । वह सभी भूमिका । करता पार ॥ ४३ ॥ देखना जो है दीखने तक । साथ देना आंखोंको दीपक । तब न दीखेगी कहां तक । वह जो वस्तु ॥ ४४ ॥ ऐसे करता जो मोक्ष प्रवर्तन । ब्रह्ममें चित्त हो जाने तक लीन । साथ रहता है वैराग्य अर्जुन । उसका नाश कैसे ॥ ४५ ॥ इसीलिये है वैराग्य । ज्ञानाभ्यासका सौभाग्य । करके देता जो योग्य । आत्म-लाभ ॥ ४६ ॥ वैराग्यका कवच पहन कर । उससे जैसे वज्रांग बनकर । वह राजयोगके तुरंग पर । होता आरूढ ॥ ४७ ॥ ८०३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
फिर जो दृश्य दृष्टि-पथमें आता । उसमें जो छोटा बड़ा दीखता । उसे मिटाने ध्यान खड्ग धरता । विवेक मुष्टिमें ॥ ४८ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ ब्रह्म प्राप्ति पथके ये शत्रु— ऐसे संसार-रणांगण पर । सूर्यसा जाता चीरता अंधार । मोक्षश्रीका बनने भर्त्तार । निर्भय होके ॥ ४९ ॥ वहां जो रोकने आता । उस वैरीको मारता । उसमें पहला होता । देहाहंकार ॥ १०५० ॥ मार कर वह नहीं छोड़ता । जन्म देकर जीने नहीं देता । पेंचमें डाल कुंठित करता । अस्थि पंजरके ॥ ५१ ॥ देह दुर्ग उसका सहारा । तोड कर लिया धनुर्धरा । तथा बल है यह दूसरा । मारा शत्रू ॥ ५२ ॥ विषयोंका नाम ही सुनकर । बढ़ जाता चौगुनेसे ऊपर । मृतावस्थामें यह धनुर्धर । पहुंचाता विश्वको ॥ ५३ ॥ वह है विषय-विषका गर्त । सब दोषोंका चक्रवर्ती पार्थ । किंतु कैसे ध्यान-खड्गका घात । सहेगा वह ॥ ५४ ॥ प्रिय विषय जब होते प्राप्त । उस सुखको कर अभिव्यक्त । वही आवरण डालके पार्थ । करता है गर्जना ॥ ५५ ॥ सन्मार्गको ही जो भुलाता । अधर्म वनमें फंसाता । बाघके मुखमें है देता । नरकादिक ॥ ५६ ॥ विश्वाससे मारता जो रिपु । निर्मम कर देता है दर्प । जिसके नामसे आता कंप । तपस्वियोंको ॥ ५७ ॥ बल दर्प अहंकार काम क्रोध परिग्रह । छोड़ कर स-ममत्व पाता है ब्रह्म शांतिसे ॥ ५३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०४
क्रोध जैसा है महादोष । जिसका होता परिपाक । भरनेसे होता अधिक । रीता ही जो ॥ ५८ ॥ वह काम जिस स्थान पर । नष्ट होता उस स्थान पर । क्रोध भी सहज धनुर्धर । होता है नष्ट ॥ ५९ ॥ जड़ ही तोड़नेसे जैसे । शाखायें नष्ट होती वैसे । वैसे ही कामके नाशसे । नासता है क्रोध ॥ १०६० ॥ इसीलिये वैरी है जो काम । उसीका मिटाया जब नाम । मिटता जैसे गमनागम । क्रोधका भी ॥ ६१ ॥ जैसे अपना अड़गोड़ा समर्थ । अपराधीके सिरपे होता पार्थ । वैसे भोग देकर होता समर्थ । परिग्रह ॥ ६२ ॥ वैसे ही खुगीर सिरपे देता । अंगांगमें अवगुण भरता । जीवके हाथमें लकड़ी देता । ममत्वकी जो ॥ ६३ ॥ शिष्य-शाखादि विलाससे । मठ मुद्रादि बहानेसे । डाले हैं जो इसने फांसे । असंगों पर भी ॥ ६४ ॥ घरमें कुटुंब रूपसे रहता । वनमें वन्य बन अवतरता । नग्न शरीरको भी चिपकता । पांडुकुमार ॥ ६५ ॥ अपरिग्रह जो ऐसा दुर्जय । उसपे भी पाकर विजय । भव विजयका धनंजय । आता उत्साह ॥ ६६ ॥ अमानित्वादि जो संपूर्ण । ज्ञानके होते सभी गुण । वैफल्य देशके प्रधान । होते हैं जैसे ॥ ६७ ॥ सम्यग्ज्ञानका राज्य अर्पण । करके वे सभी गुणगण । उसके परिवार भूषण । होके रहते हैं ॥ ६८ ॥ तब प्रवृत्तिके राज-पथमें । अवस्था-भेद प्रमदियां आपमें । दीठ उतारती प्रति-पगमें । अपने सुखकी ॥ ६९ ॥ बोधके दंडसे विवेक जब । दृश्योंकी भीड हटाता सब । योगकी भूमिका आके तब । आरती उतारती ॥ १०७० ॥ ८०५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तब ऋद्धि सिद्धिके समुदाय । आते रहते समय समय । उस पुष्प-वृष्टिसे धनंजय । नहाता रहता वह ॥ ७१ ॥ इस भांति ब्रह्मैक्यके समान । स्वराज्य आता है समीप जान । आनंदसे तीनों लोक अर्जुन । भर देता है ॥ ७२ ॥ शत्रु-मित्रभाव तब अर्जुन । नहीं रहता साम्यके कारण । न होता द्वंद्व अणु समान । उस समय ॥ ७३ ॥ यही नहीं किसी कारणसे । कभी कहें यह मेरा ऐसे । इतना द्वैत भी प्रतीतिसे । न जानता वह ॥ ७४ ॥ एक मात्र तब अपनी सत्ता । विश्व-व्यापी करके पांडुसुता । पास फटकने न देता ममता । इतना भी वह ॥ ७५ ॥ जीतकर ऐसा रिपुवर्ग । आप बन गया सारा जग । तब होगया तुरंत योग । वहां सुदृढ ॥ ७६ ॥ अपने पथके शत्रुओंको जीतनेके बाद— फिर वैराग्यका आवरण । तनपे दृढ था जो अर्जुन । करता शिथिल कुछ क्षण । उस समय ॥ ७७ ॥ चलाने ध्यानकी जो तलवार । सम्मुख नहीं द्वैत धनुर्धर । तब होता है ध्यानका भी कर । कुछ शिथिल ॥ ७८ ॥ अथवा रसौषधि जैसे । अपना काम हो जानेसे । आप ही न रहती वैसे । उसी प्रकार ॥ ७९ ॥ जैसे है जहां पहुंचना होता । वह स्थान देख पैर रुकता । वैसे ब्रह्म-दर्शनसे होता । अभ्यास शिथिल ॥ १०८० ॥ जैसे सिंधुसे संपर्क आता । गंगाका वेग भी उतरता । या पतिसे मिलके स्थिरता । आती कामिनीमें ॥ ८१ ॥ अथवा आता है जब फल । बढ़ न सकता जब केल । या गांव आते जैसे केवल । रुकता मार्ग ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०६
वैसे ही आत्म-साक्षात्कार । होता है यह देख कर । साधनाका जो हथियार । रखता नीचे ॥ ८३ ॥ इसीलिये ब्रह्मसे उसका । समय आने पर ऐक्यका । शिथिल होता है साधनोंका । वेग पार्थ ॥ ८४ ॥ वैराग्यका फिर है तिरोधान । नानाभ्यासका वार्धक्य अर्जुन । योग फलका परिपाक जान । दशा है जो ॥ ८५ ॥ तब वह शांति मान पांडुसुता । उसके अंगांगमें आती पूर्णता । ब्रह्मत्व पाके योग्य है वह होता । पुण्य-पुरुष ॥ ८६ ॥ पूर्णिमासे जैसे चतुर्दशी । अल्पत्वमें रहता है शशी । या सोलहवे कससे जैसे । पंद्रह होता अल्प ॥ ८७ ॥ सागरमें जाता पानी वेगसे । वह होता गंगौघका जैसे । तथा जो निश्चलतासे । रहता सिंधुका ॥ ८८ ॥ ब्रह्म या ब्रह्मत्वके निकट । व्यक्ति होता उसमें सुभट । ऐसा अंतर जो वह काट । पाता ब्रह्मत्व ॥ ८९ ॥ परंतु ऐसे हुए बिन । प्रतीत होता ब्रह्मपन । वही ब्रह्म होनेकी जान । योग्यता है वहां ॥ १०९० ॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥ वह ब्रह्म-भाव योग्यता । पुरुष फिर पांडुसुता । आत्म-बोधकी प्रसन्नता । पद पाता है ॥ ९१ ॥ जिस तापसे होता है पाक । वह जाता पकनेपे पाक । फिर जैसे आह्लाद कारक । होता है वह ॥ ९२ ॥ अनेक प्रवाह जैसे लगभग । शरत्कालमें तजते है गंग । अथवा गीत होनेपे उपांग । रुकते जैसे ॥ ९३ ॥ हुवा ब्रह्म प्रसन्नात्मा कामना शोकके बिन । पाता मेरी परा भक्ति देखती साम्य जो कहीं ॥ ५४ ॥ ८०७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आत्म-बोधमें ऐसा उद्यम । करते हुए होता है श्रम । उसका भी हो जाता है शम । जिस स्थानपे ॥ ९४ ॥ आत्म-बोध प्रसन्नता । कहलाती वह पार्थ ! । उसका है भोग लेता । योग-साधक ॥ ९५ ॥ ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन— उस स्थितिमें शोक करना । किसी वस्तुकी इच्छा करना । डूबती यह सब भावना । साम्य-पूरमें ॥ ९६ ॥ उदय होते ही गभस्ति । नक्षत्र-मंडलकी व्यक्ति । लोपती है उसकी दीप्ति । जिस प्रकार ॥ ९७ ॥ उदय होते ही आत्म-प्रभा । जो सारी भूत भेद व्यवस्था । तोड़ते हुए वह देखता । अपनारूप ॥ ९८ ॥ पाटी पे लिखे अक्षर । जैसे पोंछते हैं कर । वैसे खोते भेदांतर । उसकी दृष्टिमें ॥ ९९ ॥ वैसे ही जो अन्यथा ज्ञान । दिखाता जागृति स्वप्न । वे दोनों क्रियायें हैं लीन । अज्ञानमें ॥ ११०० ॥ फिर वह भी अज्ञान । बोध बढते ही लीन । उस बोधमें संपूर्ण । डूबता है ॥ १ ॥ जैसे भोजनके समय । क्षुधा क्षीणती धनंजय । वैसे ही तृप्तिके समय । होती है अस्त ॥ २ ॥ जैसे वेग बढ़ता जाता । वैसे मार्ग घटता जाता । फिर जब गंतव्य आता । डूबता मार्ग ॥ ३ ॥ या जागृतिका होता उदीपन । निद्रा क्षीण होते जाती अर्जुन वैसे ही पूर्ण जागृतिमें मान । निद्राका अंत ॥ ४ ॥ या अपना पूर्णत्व मिलता । चंद्रका बढ़ना ही मिटता । शुक्ल-पक्षका भी अंत आता । तब निःशेष ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०८
जैसे सभी पदार्थ-ज्ञान । निगल जाता मेरा ज्ञान । तब वह संपूर्ण ज्ञान । अज्ञान निगलता ॥ ६ ॥ जैसे कल्पांतके समय । नदी सिंधुके समुदाय । एक होकर धनंजय । जल होता आम्रक्ष ॥ ७ ॥ या मिटकर नाना घटाकाश । एक हो जाता है महदाकाश । या काष्ठोंसे जलके काष्ठ शेष । रहता है अग्नि ॥ ८ ॥ अथवा भूषणके आकार । आंचमें सभी पिघलकर । सारा नाम रूप मिटाकर । होता है सुवर्ण ॥ ९ ॥ अथवा होते ही जागृत । हो जाता है स्वप्नका अस्त । फिर जैसे आपही पार्थ । रह जाता है ॥ १११० ॥ वैसे ही मुझ एकको छोडकर । न उसे अपने सह कुछ और । कहाती जो चौथी भक्ति धनुर्धर । पाता है वह ॥ ११ ॥ जहां आर्त जिज्ञासू अर्थार्थी । जिस मार्गसे करते भक्ति । इसे देख मैं कहता चौथी । भक्ति इसको ॥ १२ ॥ वैसे नहीं पहली या चौथी । दूसरी तीसरी इस भांति । किंतु जो मेरी सहज स्थिति । भक्ति नाम उसका ॥ १३ ॥ मेरे अज्ञानका प्रकाशन । दिखाके मेरा अन्यथा ज्ञान । सबको सर्वत्र ही भजन- । सुझाती है ॥ १४ ॥ जहां जो जैसे देखता वैसे । उसे वहां रहता है वैसे । दीखता मेरे चित्प्रकाशसे । यह अखंड ॥ १५ ॥ स्वप्नका दीखना या न दीखना । अपने अस्तित्वपे होना जाना । जिससे विश्वका होना या न होना । प्रकाशना वैसे ॥ १६ ॥ ऐसा यह मेरा सहज । प्रकाश जो है कपिध्वज । वह भक्ति नामसे आज । कहा जाता है ॥ १७ ॥ इसीलिये आर्तोंमें जैसे । बनके उत्कट इच्छासे । अपेक्षणीय जो है उसे । भाता मैं ही ॥ १८ ॥ ८०९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जिज्ञासूके सन्मुख वीरेशा । इसी भांति होकर जिज्ञासा । मैं ही मानो जिज्ञास्यु है ऐसा । दिखाया गया है ॥ १९ ॥ ऐसे ही बनकर अर्थना । मैं ही मेरे अर्थार्थ अर्जुना । करके तब अर्थाभिधाना । लाता मुझको ही ॥ ११२० ॥ ऐसे ही अज्ञानका कर स्वीकार । करते भक्तिमें मेरा व्यवहार । दिखाती भक्ति दृश्य-रूप लेकर । मुझ द्रष्टाको ही ॥ २१ ॥ मुखको दीखता वहां मुख । इस बोलनेमें नहीं चूक । झूठा द्वैत दिखाता है देख । दर्पण यहां ॥ २२ ॥ चंद्रको ही देखते हैं नेत्र । तिमिर करता यही मात्र । दिखाता रहता है सर्वत्र । एकका होकर ॥ २३ ॥ सर्वत्र ऐसे मुझको मैं अर्जुन । भक्तिसे होता रहता आकलन । किंतु है दृश्यत्व अज्ञान कारण । व्यर्थका यहां ॥ २४ ॥ मिटा अब वह सब अज्ञान । मेरा द्रष्टृत्व मुझे मिला मान । निज-बिंबमें हुवा है विलीन । प्रतिबिंब जैसे ॥ २५ ॥ सोनेमें जब मिला रहता मल । तब भी सोना रहता है अचल । किंतु जल करके वह केवल । रहता सोना ही ॥ २६ ॥ अजी ! पूर्णमासिके पहले कहीं । चंद्रमा सावयव होता या नहीं । पूर्णचंद्र देखने मिलता यहीं । पूर्णमासीको ॥ २७ ॥ वैसे मैं अन्यथा ज्ञानसे । दीखता हूं भिन्न रूपसे । वह द्रष्टत्वमें खोनेसे । मुझे मैं भेटता ॥ २८ ॥ तभी दृश्यपथातीत । मेरा यह पांडुसुत । भक्तियोग है चतुर्थ । कहा मैंने ॥ २९ ॥ ज्ञान-भक्तिसे जो सहजरूप । भक्त मुझमें लीन हुवा आप । वह केवल मैं हूं परंतप । जानता तू यह ॥ ११३० ॥ जो मैं हुवा नहीं उसके लिये मैं है ही नहीं— मैंने ही हाथ उठाकर । ज्ञानी भक्त जो धनुर्धर । मेरा आत्मा इस प्रकार । कहा सातवेमें ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१०
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥ भक्ति जो कल्पादिमें मुझसे । उपदेश रूप जो ब्रह्मसे । कही गयी है उत्तम ऐसे । भागवतद्वारा ॥ ३२ ॥ ज्ञानी इसको स्व-संवित्ति । शैव कहते इसे शक्ति । तथा हम परम-भक्ति । कहते अपनी ॥ ३३ ॥ मुझसे मिलते हुए यह भक्ति । उस श्रमयोगियोंको है फलती । फिर समस्त विश्वको ही देखती । मेरे ही रूपमें ॥ ३४ ॥ वहां वैराग्य विवेकके साथ । मिटता है बंध मोक्ष समस्त । डूबती वृत्ति ध्यान सह पार्थ । उस समय ॥ ३५ ॥ चारों तत्त्वोंको निगलकर । रहता आकार मात्र धनुर्धर । नहीं रहता उसका ओर छोर । कल्पांतमें जैसे ॥ ३६ ॥ उस भांति होकर कूटस्थ । शुद्ध मैं साध्य साधनातीत । वह बनकर मुझे पार्थ । भोगता है ॥ ३७ ॥ बनकर सिंधुका अंग । सिंधुपे झलकती गंग । ऐसे रूपका उसका भोग । सुन तू यह ॥ ३८ ॥ या दर्पणको ही दर्पण । दिखाया मान तू अर्जुन । बढ़ता तब दृष्टापन । वैसे इस भोगमें ॥ ३९ ॥ जागृतका जब स्वप्न नाशता । अपना ही तब ऐक्य दीखता । जैसे जागृतिका ऐक्य भोगता । बिनाद्वैतके ॥ ११४० ॥ जाने दो जब दर्पण खोता । तब मुख-बोध भी ले जाता । मुख-सौंदर्य आप भोगता । अकेला जैसे ॥ ४१ ॥ वही होनेसे भोग उसका । न होता यह भाव जिसका । शब्दसे कैसे करें शब्दका । कह तू उच्चार ॥ ४२ ॥
भक्तिसे तत्त्वता जान कौन मैं कितना रहा । इस भांति मुझे जान मुझमें मिलते फिर ॥ ५५ ॥ ८११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.
किसके गांवमें दीपकसे । सूर्यको उजाला जाता कैसे । व्योमके लिये मांडव कैसे । उभारते न जाने ॥ ४३ ॥ अपनेमें नहीं जब राजपन । भोगेगा कैसा जी राजा राजपन । या अंधार करेगा आलिंगन । सूर्यसे कैसे ॥ ४४ ॥ अथवा जो नहीं है आकाश । वह जानेगा कैसे आकाश । गूंणचीका गहना विशेष । सोहेगा क्या रत्नोमें ॥ ४५ ॥ इसीलिये जो मैं हुवा नहीं । उसके लिये मैं है ही नहीं । फिर भजेगा कैसे जो कोई । कह तू मुझसे ॥ ४६ ॥ अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता किंतु भक्ति होती है— इसी लिये है वह क्रमयोगी । मैं बनकर मेरा भोगी । तारुण्य भोगती है तरुणांगी । उसी प्रकार ॥ ४७ ॥ तोय करता सर्वांगसे यदि चुंबन । प्रभा सर्वत्र विलसती है बिंब मान । नाना आकाश नभमें होकर विलीन । भोगते हैं जैसे ॥ ४८ ॥ वैसे है जो मेरा ही रूप होकर । अक्रिय भजता मुझे निरंतर । भोगता रहता जैसे अलंकार । स्वर्णको ही ॥ ४९ ॥ चंदनकी सुगंध जैसे । चंदन भोगती आपसे । या स्वाभाविक चंद्र जैसे । चंद्रिकाको ॥ ११५० ॥ ऐसे वह क्रिया नहीं सहता । अद्वैतमें भक्ति होती है पार्था । यह अनुभवसे जाना जाता । तोलनेसे नहीं ॥ ५१ ॥ तब पूर्व संस्कारके कारण । जो कुछ होता है यह भाषण । वह विनय सुन मैं अर्जुन । बोलता हूं ॥ ५२ ॥ शब्दको शब्द ही जब मिलता । बोलका व्यवहार नहीं होता । तब है मौन ही स्तवन होता । सुंदर मेरा ॥ ५३ ॥ इसीलिये जब वह बोलता । बोलने वालेसे मैं हूं मिलता । तब मौनसे ही वह तत्वता । स्तवता मुझको ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१२
वैसे ही बुद्धि हो अथवा दृष्टि । जिसे देखना चाहती किरीटी । उस दृष्टिको ही हराके दृष्टि । दिखाती अपनेको ॥ ५५ ॥ दर्पणके पहले अपना मुख । देखनेवाला ही देखता देख । उसीको दर्पणमें वही देख - । सकता है जैसे ॥ ५६ ॥ वैसे दृश्य मिटकर द्रष्टा । जैसे मिलता द्रष्टासे द्रष्टा । वैसे अकेलेमें नहीं मिटा । द्रष्टापन कभी ॥ ५७ ॥ जैसे स्वप्नकी प्रियाको मान । जगके करना आलिंगन । रहता है आपही अर्जुन । प्रियाप्रिय मिलके ॥ ५८ ॥ या दो लकड़ियोंका घर्षण । उससे उठता अग्निकण । दोकी भाषा मिटाके अर्जुन । रहता वह एक ॥ ५९ ॥ क्रमयोगी सदैव मुझे भोगता रहता है— करमें ले अनेक प्रतिबिंब । लेके चलता जब सूर्यबिंब । प्रतिबिंबके साथही बिंब । न होता बिंबत्व ॥ ११६० ॥ वैसा मैं होकर देखता । वह दृश्यको ही ले जाता । वहां दृश्य भी नहीं होता । द्रष्टापन भी ॥ ६१ ॥ रवि अंधार प्रकाशता । न होती जैसे प्रकाश्यता । वैसे दृश्यमें द्रष्टा । मैं होनेसे ॥ ६२ ॥ फिर देखना या न देखना । ऐसी दशाको अनुभवना । यह है जो वास्तविक होना । दर्शन मेरा ॥ ६३ ॥ जो कुछ वह देखता । द्रष्टा दृश्यातीत हो पार्था । इस दृष्टिसे है भोगता । क्रमयोगी सदा ॥ ६४ ॥ तथा आकाश आकाशसे जैसे । भरकर नहीं हिलता वैसे । मैं आत्मासे अपनेमें भी वैसे । होता है उसको ॥ ६५ ॥ कल्पांतमें उदकसे उदक । रोकनेसे सबही जैसे देख । रुक जाता वैसे आत्मासे एक । भर जाता वह ॥ ६६ ॥ पैर अपने पर कैसे चढेगा । अग्नि अपनेको कैसे जलायेगा । पानी आपही कैसे स्नान करेगा । अपनेसेही ॥ ६७ ॥ ८१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
सभी मैं होनेसे अर्जुना । रुक जाता है आना जाना । यही है यात्रादि करना । मुझ अद्वयको ॥ ६८ ॥ जैसे जल पर तरंग । यदि दौड़ता है सवेग । फिर भी नहीं भूमिभाग । आक्रमता वैसे ॥ ६९ ॥ उसका तजना या धरना । चलना अथवा रुकना । वह उदक ही एक पूर्ण । इसी प्रकार ॥ ११७० ॥ तमी वह कहीं भी जाता । उदक परसे ही पार्था । आरंभकी एकात्मकता । न टूटती कभी ॥ ७१ ॥ ऐसे वह मैं से भरा रहता । संपूर्ण ही वह मद्रूप होता । ऐसे वह सदा यात्रा करता । मेरी ही अर्जुन ॥ ७२ ॥ तथा कभी शरीर स्वभावसे । कहीं कुछ भी कर बैठनेसे । तब इस कारण मैं ही उसे । प्राप्त होता हूं ॥ ७३ ॥ वहां है कर्म और कर्ता । यह सब मिटके पार्था । मैं आत्मा ही मुझ देखता । अपने आप ॥ ७४ ॥ तब वह न रहनेकासा रहता है न करनेकासा करता है— दर्पणसे जैसे दर्पण । देखा तो न होता दर्शन । सोनेसे ढकता स्वर्ण । न ढकने जैसे ॥ ७५ ॥ दीपको जब दीप प्रकाशता । वह न प्रकाशना ही बनता । वैसे ही जब मैं कर्म करता । न करने जैसे ॥ ७६ ॥ कर्म भी वह करता रहता । किंतु कर्तव्य-भाव न रहता । वह करना न-करना होता । ऐसे समय ॥ ७७ ॥ कर्म तब जब मद्रूप बनता । तब वह कुछ करना न होता । उसका नाम ही पूजन हो जाता । यह है रहस्य ॥ ७८ ॥ ऐसे करके भी सब । न करना होता तब । होती महापूजा जब । इस पूजासे ॥ ७९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१४
तब जो बोलता वह स्तवन । जो कुछ देखता वह दर्शन । मेरे अद्वयका होगा गमन । वह जो चलता ॥ ११८० ॥ वह जो करता वही पूजन । सोचता वह है मेरा स्मरण । ऐसे वह रहता है अर्जुन । रहना मुझमें ॥ ८१ ॥ जैसे सुवर्णका भूषण । सुवर्णमें होता अभिन्न । वैसे भक्ति-योगी अर्जुन । रहता मुझमें ॥ ८२ ॥ उदकमें जैसे कलोल । कर्पूरमें है परिमल । वैसे ही रत्नमें उजाल । अनन्य जैसे ॥ ८३ ॥ अथवा तंतुसे है पट । या माटीसे रहता घट । वैसे समरस सुभट । होता मुझसे ॥ ८४ ॥ यह है जानना सिद्ध भक्ति । अथवा संपूर्ण दृश्य जाति । आप जैसे देखना सुमति । आत्मत्वसे जो ॥ ८५ ॥ तीनों अवस्थाओके द्वारा । उपाधि उपहिताकार । भाव अभाव रूप स्फुर । दृश्य जो यह ॥ ८६ ॥ दृष्टा मैं यह संपूर्ण । ऐसे बोधमें अर्जुन । करना वह नर्तन । ढेंडा जैसे ॥ ८७ ॥ रज्जूको जब देखकर । आभास होता व्यालाकार । वह रज्जू ऐसा निर्धार । होता जैसे ॥ ८८ ॥ वैसे सुवर्णसे परे कहीं । रत्ती भी भूषण होता नहीं । यह सब गलाकार नहीं । करना निश्चित ॥ ८९ ॥ उदकके उस पार । नहीं होता है लहर । वहां स्वतंत्र आकार । न मानते जैसे ॥ ११९० ॥ या स्वप्नके सभी पदार्थ । जगकर देखा तो पार्थ । अपनेसे सभी पदार्थ । दीखते वे भिन्न ॥ ९१ ॥ यह सब जिसका स्फुरण है उस 'मैं' का स्वरूप— तथा जो भावाभाव रहता । और जो कुछ ज्ञेय स्फुरता । उसे मैं अनुभवता ज्ञाता । ऐसे भोगता वह ॥ ९२ ॥ ८१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जानता अज मैं अजर । अक्षय तथा मैं अक्षर । अपूर्व और मैं अपार । आनंद मैं हूं ॥ ९३ ॥ अचल मैं अच्युत । अनंत मैं अद्वैत । आद्य मैं हूं अव्यक्त । व्यक्त भी मैं ॥ ९४ ॥ ईश्य मैं हूं ईश्वर । अनादि मैं अमर । अभय मैं आधार । अज्ञेय भी मैं ॥ ९५ ॥ स्वामी मैं सदोदित । सहज मैं सतत । सर्व मैं सर्वगत । सर्वातीत भी मैं ॥ ९६ ॥ नवीन मैं पुराण । शून्य और संपूर्ण । स्थूल तथा मैं अणु । जो कुछ सबमें ॥ ९७ ॥ अक्रिय मैं हूं एक । असंग मैं अशोक । व्याप्त और व्यापक । पुरुषोत्तम मैं ॥ ९८ ॥ अशब्द मैं अश्रोत्र । अरूप मैं अगोत्र । सम और स्वतंत्र । ब्रह्म हूं मैं ॥ ९९ ॥ ऐसे आत्मत्वसे मुझे एक । अद्वय भक्तिसे मान ठीक । इस बोधको जानना देख । वह भी मैं हूं ॥ १२०० ॥ अजी ! जागृत होने पर जैसे । अपना एकत्व रहता वैसे । वही स्फुरता है उसको जैसे । कुछ समय ॥ १ ॥ अथवा प्रकाश कर अर्क । वही रहता है प्रकाशक । उसके अभेद्यका द्योतक । वही होता जैसे ॥ २ ॥ वैसे ही वेद्यका होता विलय । वेदक ही रहता धनंजय । वही होता है उसको वेद्य । यह भी जानता वह ॥ ३ ॥ ज्ञानका विवेचन— अपना यह अद्वयपन । जानना है जो ज्ञान अर्जुन । वह ईश्वर मैं यह भान । होता है उसको ॥ ४ ॥ फिर द्वैत अद्वैतातीत । आत्मा हूं मैं एक विश्रांत । यह मान करके पार्थ । अनुभवना यह ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१६
जगनेपे जैसे अकेलापन । अपने आप जाता है अर्जुन । तब क्या होता है इसका ज्ञान । नहीं होता वैसे ॥ ६ ॥ देखते जब स्वर्ण भूषण । तब जान कर यह स्वर्ण । न गलाते ही वह भूषण । गलता है जैसे ॥ ७ ॥ लवण पिघल कर होता है नीर । तब रहता उसमें कुछ क्षार । वैसे ही फिर मिट जाता है क्षार । रहता उदक मात्र ॥ ८ ॥ समरस भक्तिकी अद्वयावस्थाका विवेचन— वैसे ही मैं और वह ऐसे जो होता । स्वानंदानुभव समरसमें पार्था । सान कर जब एक रूप हो जाता । मुझमें सब ॥ ९ ॥ तब वह यह ऐसा बोल मिटता । कह तू तब मैं किसके लिये होता । ऐसे मैं वह यह सब ही मिटता । स्वरूपमें ही ॥ १२१० ॥ कर्पूर जब जल चुकता । अग्नि भी तब समाप्त होता । तब उभयातीत रहता । आकाश मात्र ॥ ११ ॥ या एकमेंसे जब एक जाता । केवल शून्य मात्र है रहता । तब है नहीं सब ही मिट जाता । शेष रहता मैं ही ॥ १२ ॥ वहां ब्रह्म आत्मा ईश । मिटती है ऐसी भाष । अबोलका अवकाश । वहं भी नहीं होता ॥ १३ ॥ न बोलना भी है बोलकर । वह भी बोलके मुह भर । जानना न जानना भूलकर । जाना जानना जो ॥ १४ ॥ बोधसे जहां बोध जानना । आनंदसे आनंद भोगना । सुखसे सुख अनुभवना । होता है केवल ॥ १५ ॥ वहां जुडता लाभ लाभमें । मिलती है प्रभा प्रभामें । डूब कर खड़ा विस्मयमें । स्वयं विस्मय ॥ १६ ॥ साम्य हुवा है वहां समसे । विश्राम हुवा है विश्रांतिसे । अनुभव पगलाया है जैसे । अनुभूतिमें ही ॥ १७ ॥ (91) ८१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अथवा मानो ऐसे निखिल । मैं पनका मिलता है फल । सेवन करती लता वेल । क्रमयोगका वह ॥ १८ ॥ क्रमयोगी चक्रवर्तिके मुकुट पर । रहता है चिद्घन मैं ऐसा अलंकार । अपनी जीव-दशा मुझे अर्पण कर । पाया उपलक्षमें ॥ १९ ॥ क्रमयोग प्रासादका । कलश जो है मोक्षका । उसके अवकाशका । हुवा जो विस्तार ॥ १२२० ॥ इस संसारके अरण्यमें । क्रमयोगकी इस राहमें । जुड जाता मदैक्य ग्राममें । चलने पर जो ॥ २१ ॥ अथवा क्रमयोग ओघ । मिलके भक्त-चित्त गंगौघ । पाया स्वानंदोदधि सवेग । मद्रूपका ॥ २२ ॥ यहां तक जो सुवर्म । क्रमयोगकी महिमा । तुझसे कहते हम । बार बार ॥ २३ ॥ देश काल और पदार्थ । साधके मुझे पाना पार्थ । ऐसा नहीं मैं हूं समस्त । सबका हूं सर्वस्व ॥ २४ ॥ इसलिये हे मदर्थ । न करना कुछ पार्थ । मिलता हूं मैं सतत । इस उपायसे ॥ २५ ॥ गीताकी महत्ताका कथन- एक शिष्य एक गुरु । रूढ यह व्यवहार । यह मत्प्राप्ति प्रकार । जाननेमें ॥ २६ ॥ वसुधाके उदरमें अर्जुन । रखा रहता है सिद्ध निधान । या अग्निका काठ दूधका स्तन । स्थान है जैसे ॥ २७ ॥ स्वभाव सिद्ध ही यह होता । किंतु उपायसे ही मिलता । सिद्ध जो होता वही मिलता । वैसा ही मैं ॥ २८ ॥ फल कहने पर क्या उपाय । कहता है यहां श्रीकृष्णराय । इसको कहनेका अभिप्राय । यहां है ऐसे ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१८
गीतार्थकी है श्रेष्ठता । मोक्षोपायही है पूर्णता । न अन्य शास्त्रसा होता । प्रमाणसिद्ध ॥ १२३० ॥ वायु जैसे बादल हटाता । सूर्यको वह नहीं बनाता । या हाथ जलकुंबी हटाता । न बनाता नीर ॥ ३१ ॥ आत्म-दर्शनके आड सकल । रहता है जो अविद्याका मल । नाशते हैं शास्त्र वह निर्मल । तब मैं प्रकाशता ॥ ३२ ॥ इसीलिये जो सभी शास्त्र । अविद्या नाशके हैं पात्र । किंतु नहीं है वे स्वतंत्र । आत्म-बोधमें ॥ ३३ ॥ जहां तक अध्यात्म शास्त्रकी बात । उसकी सच्चाईका प्रश्न निश्चित । आता है तब अंतिम यह गीता । शास्त्र है श्रेष्ठ ॥ ३४ ॥ प्राची जैसे सूर्यसे विभूषित । करती दिशा सतेज सतत । वैसे शास्त्रेश्वर गीता सनाथ । करती शास्त्रोंको ॥ ३५ ॥ बोले हैं ऐसे ये शास्त्रेश्वर । पीछे ही उपाय सविस्तर । जिससे हाथसे ले उठाकर । आत्मतत्व ॥ ३६ ॥ किंतु प्रथम वचनको अर्जुन । न स्वीकारें यदि तत्व अर्जुन । इस विचारसे हो सकरुण । कहता है श्रीहरि ॥ ३७ ॥ वही प्रमेय इस अवसर । शिष्यको करनेके लिये स्थिर । कह रहा है फिर एक बार । यहां श्रीकृष्ण ॥ ३८ ॥ प्रसंग भी है गीता-ग्रंथ । मुक्तायका आया साथ । तभी है दिखाता साद्यंत । एकार्थत्व ॥ ३९ ॥ गीताग्रंथ मध्य-भागमें । नाना अधिकार प्रसंगमें । अनेक सिद्धांतके रूपमें । किया निरूपण ॥ १२४० ॥ वहां जो है सब सिद्धांत । इस शास्त्रमें हैं प्रस्तुत । परंपरासे हो अज्ञात । मानेगा कोई ॥ ४१ ॥ उस महासिद्धांतके अंतर्गत । आ गये हैं अन्य अनेक सिद्धांत । उन सबके साथ ग्रंथ समाप्त । करता है श्रीहरि ॥ ४२ ॥ ८१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अविद्या-नाशका है स्थल । जिससे है मोक्ष प्राप्तिका फल । इन दोनों विषयोंका केवल । साधन है ज्ञान ॥ ४३ ॥ इतने ही हैं जो नाना प्रकार । कहे हैं ग्रंथ विस्तार कर । उसीको अल्पमें चक्रधर । कहता है अब ॥ ४४ ॥ तभी साध्य प्राप्त होने पर । साधनाका विवेचन कर । कहता कर ग्रंथ विस्तार । इसी भावसे ॥ ४५ ॥ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ गीता साधनाका सारांशमें पुनःकथन- कहता फिर हे सुभट । क्रमयोगी वह स-निष्ठ । मैं होके करता प्रविष्ट । मेरे ही रूपमें ॥ ४६ ॥ स्वकर्मोंके सुमनोंसे । मेरी पूजा करनेसे । पाता प्रसाद रूपसे । ज्ञान-निष्ठाको ॥ ४७ ॥ ज्ञान जब वह हाथ आता । भक्तिमें है उल्लास भरता । इससे फिर है सुख पाता । समरस होके ॥ ४८ ॥ करता जो विश्व-प्रकाशन । आत्मा जो वह मैं हूं अर्जुन । वह आत्मा सर्वव्यापी मान । अनुकरण करता ॥ ४९ ॥ तजके अपनी कठोरता । नून जैसे पानीमें घुलता । या चलके वायु है समाता । आकाशमें जैसे ॥ १२५० ॥ वैसे ही काया वाचा मनसे । मेरा आश्रय करता उसे । निषिद्ध कर्म भी भूलसे । करता तब ॥ ५१ ॥ आनेसे जैसे गंगाका संबंध । गंदा नाला होता है महानद । वैसे ही होने पर मेरा बोध । न रहता शुभाशुभ ॥ ५२ ॥ मेरे आश्रयमें नित्य करके सब कर्मको । पाता मेरी कृपासे ही मेरा ही पद शाश्वत ॥ ६६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२०