भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 886

सभी मैं होनेसे अर्जुना । रुक जाता है आना जाना । यही है यात्रादि करना । मुझ अद्वयको ॥ ६८ ॥ जैसे जल पर तरंग । यदि दौड़ता है सवेग । फिर भी नहीं भूमिभाग । आक्रमता वैसे ॥ ६९ ॥ उसका तजना या धरना । चलना अथवा रुकना । वह उदक ही एक पूर्ण । इसी प्रकार ॥ ११७० ॥ तमी वह कहीं भी जाता । उदक परसे ही पार्था । आरंभकी एकात्मकता । न टूटती कभी ॥ ७१ ॥ ऐसे वह मैं से भरा रहता । संपूर्ण ही वह मद्रूप होता । ऐसे वह सदा यात्रा करता । मेरी ही अर्जुन ॥ ७२ ॥ तथा कभी शरीर स्वभावसे । कहीं कुछ भी कर बैठनेसे । तब इस कारण मैं ही उसे । प्राप्त होता हूं ॥ ७३ ॥ वहां है कर्म और कर्ता । यह सब मिटके पार्था । मैं आत्मा ही मुझ देखता । अपने आप ॥ ७४ ॥ तब वह न रहनेकासा रहता है न करनेकासा करता है— दर्पणसे जैसे दर्पण । देखा तो न होता दर्शन । सोनेसे ढकता स्वर्ण । न ढकने जैसे ॥ ७५ ॥ दीपको जब दीप प्रकाशता । वह न प्रकाशना ही बनता । वैसे ही जब मैं कर्म करता । न करने जैसे ॥ ७६ ॥ कर्म भी वह करता रहता । किंतु कर्तव्य-भाव न रहता । वह करना न-करना होता । ऐसे समय ॥ ७७ ॥ कर्म तब जब मद्रूप बनता । तब वह कुछ करना न होता । उसका नाम ही पूजन हो जाता । यह है रहस्य ॥ ७८ ॥ ऐसे करके भी सब । न करना होता तब । होती महापूजा जब । इस पूजासे ॥ ७९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१४