ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे ही बुद्धि हो अथवा दृष्टि । जिसे देखना चाहती किरीटी । उस दृष्टिको ही हराके दृष्टि । दिखाती अपनेको ॥ ५५ ॥ दर्पणके पहले अपना मुख । देखनेवाला ही देखता देख । उसीको दर्पणमें वही देख - । सकता है जैसे ॥ ५६ ॥ वैसे दृश्य मिटकर द्रष्टा । जैसे मिलता द्रष्टासे द्रष्टा । वैसे अकेलेमें नहीं मिटा । द्रष्टापन कभी ॥ ५७ ॥ जैसे स्वप्नकी प्रियाको मान । जगके करना आलिंगन । रहता है आपही अर्जुन । प्रियाप्रिय मिलके ॥ ५८ ॥ या दो लकड़ियोंका घर्षण । उससे उठता अग्निकण । दोकी भाषा मिटाके अर्जुन । रहता वह एक ॥ ५९ ॥ क्रमयोगी सदैव मुझे भोगता रहता है— करमें ले अनेक प्रतिबिंब । लेके चलता जब सूर्यबिंब । प्रतिबिंबके साथही बिंब । न होता बिंबत्व ॥ ११६० ॥ वैसा मैं होकर देखता । वह दृश्यको ही ले जाता । वहां दृश्य भी नहीं होता । द्रष्टापन भी ॥ ६१ ॥ रवि अंधार प्रकाशता । न होती जैसे प्रकाश्यता । वैसे दृश्यमें द्रष्टा । मैं होनेसे ॥ ६२ ॥ फिर देखना या न देखना । ऐसी दशाको अनुभवना । यह है जो वास्तविक होना । दर्शन मेरा ॥ ६३ ॥ जो कुछ वह देखता । द्रष्टा दृश्यातीत हो पार्था । इस दृष्टिसे है भोगता । क्रमयोगी सदा ॥ ६४ ॥ तथा आकाश आकाशसे जैसे । भरकर नहीं हिलता वैसे । मैं आत्मासे अपनेमें भी वैसे । होता है उसको ॥ ६५ ॥ कल्पांतमें उदकसे उदक । रोकनेसे सबही जैसे देख । रुक जाता वैसे आत्मासे एक । भर जाता वह ॥ ६६ ॥ पैर अपने पर कैसे चढेगा । अग्नि अपनेको कैसे जलायेगा । पानी आपही कैसे स्नान करेगा । अपनेसेही ॥ ६७ ॥ ८१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'