ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिसके गांवमें दीपकसे । सूर्यको उजाला जाता कैसे । व्योमके लिये मांडव कैसे । उभारते न जाने ॥ ४३ ॥ अपनेमें नहीं जब राजपन । भोगेगा कैसा जी राजा राजपन । या अंधार करेगा आलिंगन । सूर्यसे कैसे ॥ ४४ ॥ अथवा जो नहीं है आकाश । वह जानेगा कैसे आकाश । गूंणचीका गहना विशेष । सोहेगा क्या रत्नोमें ॥ ४५ ॥ इसीलिये जो मैं हुवा नहीं । उसके लिये मैं है ही नहीं । फिर भजेगा कैसे जो कोई । कह तू मुझसे ॥ ४६ ॥ अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता किंतु भक्ति होती है— इसी लिये है वह क्रमयोगी । मैं बनकर मेरा भोगी । तारुण्य भोगती है तरुणांगी । उसी प्रकार ॥ ४७ ॥ तोय करता सर्वांगसे यदि चुंबन । प्रभा सर्वत्र विलसती है बिंब मान । नाना आकाश नभमें होकर विलीन । भोगते हैं जैसे ॥ ४८ ॥ वैसे है जो मेरा ही रूप होकर । अक्रिय भजता मुझे निरंतर । भोगता रहता जैसे अलंकार । स्वर्णको ही ॥ ४९ ॥ चंदनकी सुगंध जैसे । चंदन भोगती आपसे । या स्वाभाविक चंद्र जैसे । चंद्रिकाको ॥ ११५० ॥ ऐसे वह क्रिया नहीं सहता । अद्वैतमें भक्ति होती है पार्था । यह अनुभवसे जाना जाता । तोलनेसे नहीं ॥ ५१ ॥ तब पूर्व संस्कारके कारण । जो कुछ होता है यह भाषण । वह विनय सुन मैं अर्जुन । बोलता हूं ॥ ५२ ॥ शब्दको शब्द ही जब मिलता । बोलका व्यवहार नहीं होता । तब है मौन ही स्तवन होता । सुंदर मेरा ॥ ५३ ॥ इसीलिये जब वह बोलता । बोलने वालेसे मैं हूं मिलता । तब मौनसे ही वह तत्वता । स्तवता मुझको ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१२