भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अथवा मानो ऐसे निखिल । मैं पनका मिलता है फल । सेवन करती लता वेल । क्रमयोगका वह ॥ १८ ॥ क्रमयोगी चक्रवर्तिके मुकुट पर । रहता है चिद्घन मैं ऐसा अलंकार । अपनी जीव-दशा मुझे अर्पण कर । पाया उपलक्षमें ॥ १९ ॥ क्रमयोग प्रासादका । कलश जो है मोक्षका । उसके अवकाशका । हुवा जो विस्तार ॥ १२२० ॥ इस संसारके अरण्यमें । क्रमयोगकी इस राहमें । जुड जाता मदैक्य ग्राममें । चलने पर जो ॥ २१ ॥ अथवा क्रमयोग ओघ । मिलके भक्त-चित्त गंगौघ । पाया स्वानंदोदधि सवेग । मद्रूपका ॥ २२ ॥ यहां तक जो सुवर्म । क्रमयोगकी महिमा । तुझसे कहते हम । बार बार ॥ २३ ॥ देश काल और पदार्थ । साधके मुझे पाना पार्थ । ऐसा नहीं मैं हूं समस्त । सबका हूं सर्वस्व ॥ २४ ॥ इसलिये हे मदर्थ । न करना कुछ पार्थ । मिलता हूं मैं सतत । इस उपायसे ॥ २५ ॥ गीताकी महत्ताका कथन- एक शिष्य एक गुरु । रूढ यह व्यवहार । यह मत्प्राप्ति प्रकार । जाननेमें ॥ २६ ॥ वसुधाके उदरमें अर्जुन । रखा रहता है सिद्ध निधान । या अग्निका काठ दूधका स्तन । स्थान है जैसे ॥ २७ ॥ स्वभाव सिद्ध ही यह होता । किंतु उपायसे ही मिलता । सिद्ध जो होता वही मिलता । वैसा ही मैं ॥ २८ ॥ फल कहने पर क्या उपाय । कहता है यहां श्रीकृष्णराय । इसको कहनेका अभिप्राय । यहां है ऐसे ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१८