ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतार्थकी है श्रेष्ठता । मोक्षोपायही है पूर्णता । न अन्य शास्त्रसा होता । प्रमाणसिद्ध ॥ १२३० ॥ वायु जैसे बादल हटाता । सूर्यको वह नहीं बनाता । या हाथ जलकुंबी हटाता । न बनाता नीर ॥ ३१ ॥ आत्म-दर्शनके आड सकल । रहता है जो अविद्याका मल । नाशते हैं शास्त्र वह निर्मल । तब मैं प्रकाशता ॥ ३२ ॥ इसीलिये जो सभी शास्त्र । अविद्या नाशके हैं पात्र । किंतु नहीं है वे स्वतंत्र । आत्म-बोधमें ॥ ३३ ॥ जहां तक अध्यात्म शास्त्रकी बात । उसकी सच्चाईका प्रश्न निश्चित । आता है तब अंतिम यह गीता । शास्त्र है श्रेष्ठ ॥ ३४ ॥ प्राची जैसे सूर्यसे विभूषित । करती दिशा सतेज सतत । वैसे शास्त्रेश्वर गीता सनाथ । करती शास्त्रोंको ॥ ३५ ॥ बोले हैं ऐसे ये शास्त्रेश्वर । पीछे ही उपाय सविस्तर । जिससे हाथसे ले उठाकर । आत्मतत्व ॥ ३६ ॥ किंतु प्रथम वचनको अर्जुन । न स्वीकारें यदि तत्व अर्जुन । इस विचारसे हो सकरुण । कहता है श्रीहरि ॥ ३७ ॥ वही प्रमेय इस अवसर । शिष्यको करनेके लिये स्थिर । कह रहा है फिर एक बार । यहां श्रीकृष्ण ॥ ३८ ॥ प्रसंग भी है गीता-ग्रंथ । मुक्तायका आया साथ । तभी है दिखाता साद्यंत । एकार्थत्व ॥ ३९ ॥ गीताग्रंथ मध्य-भागमें । नाना अधिकार प्रसंगमें । अनेक सिद्धांतके रूपमें । किया निरूपण ॥ १२४० ॥ वहां जो है सब सिद्धांत । इस शास्त्रमें हैं प्रस्तुत । परंपरासे हो अज्ञात । मानेगा कोई ॥ ४१ ॥ उस महासिद्धांतके अंतर्गत । आ गये हैं अन्य अनेक सिद्धांत । उन सबके साथ ग्रंथ समाप्त । करता है श्रीहरि ॥ ४२ ॥ ८१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग