भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अविद्या-नाशका है स्थल । जिससे है मोक्ष प्राप्तिका फल । इन दोनों विषयोंका केवल । साधन है ज्ञान ॥ ४३ ॥ इतने ही हैं जो नाना प्रकार । कहे हैं ग्रंथ विस्तार कर । उसीको अल्पमें चक्रधर । कहता है अब ॥ ४४ ॥ तभी साध्य प्राप्त होने पर । साधनाका विवेचन कर । कहता कर ग्रंथ विस्तार । इसी भावसे ॥ ४५ ॥ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ गीता साधनाका सारांशमें पुनःकथन- कहता फिर हे सुभट । क्रमयोगी वह स-निष्ठ । मैं होके करता प्रविष्ट । मेरे ही रूपमें ॥ ४६ ॥ स्वकर्मोंके सुमनोंसे । मेरी पूजा करनेसे । पाता प्रसाद रूपसे । ज्ञान-निष्ठाको ॥ ४७ ॥ ज्ञान जब वह हाथ आता । भक्तिमें है उल्लास भरता । इससे फिर है सुख पाता । समरस होके ॥ ४८ ॥ करता जो विश्व-प्रकाशन । आत्मा जो वह मैं हूं अर्जुन । वह आत्मा सर्वव्यापी मान । अनुकरण करता ॥ ४९ ॥ तजके अपनी कठोरता । नून जैसे पानीमें घुलता । या चलके वायु है समाता । आकाशमें जैसे ॥ १२५० ॥ वैसे ही काया वाचा मनसे । मेरा आश्रय करता उसे । निषिद्ध कर्म भी भूलसे । करता तब ॥ ५१ ॥ आनेसे जैसे गंगाका संबंध । गंदा नाला होता है महानद । वैसे ही होने पर मेरा बोध । न रहता शुभाशुभ ॥ ५२ ॥ मेरे आश्रयमें नित्य करके सब कर्मको । पाता मेरी कृपासे ही मेरा ही पद शाश्वत ॥ ६६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२०