ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा कूरा अथवा चंदन । नहीं करता अग्नि भक्षण । तब तक रहते हैं भिन्न । इस प्रकार ॥ ५३ ॥ पांच अथवा षोड़श । तब तक होता कस । जब तक है पारस । नहीं छूता ॥ ५४ ॥ ऐसे हैं यह शुभाशुभ । रहता है भरतर्षभ । जब तक न होता लाभ । मेरे प्रकाशका ॥ ५५ ॥ अजी ! रात्र और दिव । तब तक द्वैत भाव । जब तक है अभाव । सूर्यका जहां ॥ ५६ ॥ इसीलिये होते ही मेरी भेट । उसके सभी कर्म हैं सुभट । मिट कर मिल जाता है पाट । मेरे सायुज्यका ॥ ५७ ॥ देश काल तथा स्वभाव । जिसका नाश न संभव । ऐसा पद वह पांडव । पाता अविनाशी ॥ ५८ ॥ अथवा मानो पांडुसुता । आत्माकी मेरी प्रसन्नता । अलंकार उसे मिलता । इससे बड़ा क्या लाभ ॥ ५९ ॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥ समर्पणका रहस्य— इसीलिये हे अर्जुन । सभी कर्म समर्पण । कर तू अपने जान । मेरे स्वरूपमें ॥ १२६० ॥ वह समर्पण धनुर्धर । कृत्रिम रूपसे तू न कर । आत्म-विवेकसे धरकर । कर तू चित्तवृत्तिको ॥ ६१ ॥ फिर वह विवेक बल । सभी कर्ममें जो निराला । मेरे रूपमें ही निर्मल । देखेगा तू ॥ ६२ ॥ मुझ मत्पर वृत्तीसे सौंपके कर्म जो सब । समत्वमें स्थिरतासे मुझमें चित्त तू रख ॥ ५७ ॥ ८२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग