ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 889, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजगनेपे जैसे अकेलापन । अपने आप जाता है अर्जुन । तब क्या होता है इसका ज्ञान । नहीं होता वैसे ॥ ६ ॥ देखते जब स्वर्ण भूषण । तब जान कर यह स्वर्ण । न गलाते ही वह भूषण । गलता है जैसे ॥ ७ ॥ लवण पिघल कर होता है नीर । तब रहता उसमें कुछ क्षार । वैसे ही फिर मिट जाता है क्षार । रहता उदक मात्र ॥ ८ ॥ समरस भक्तिकी अद्वयावस्थाका विवेचन— वैसे ही मैं और वह ऐसे जो होता । स्वानंदानुभव समरसमें पार्था । सान कर जब एक रूप हो जाता । मुझमें सब ॥ ९ ॥ तब वह यह ऐसा बोल मिटता । कह तू तब मैं किसके लिये होता । ऐसे मैं वह यह सब ही मिटता । स्वरूपमें ही ॥ १२१० ॥ कर्पूर जब जल चुकता । अग्नि भी तब समाप्त होता । तब उभयातीत रहता । आकाश मात्र ॥ ११ ॥ या एकमेंसे जब एक जाता । केवल शून्य मात्र है रहता । तब है नहीं सब ही मिट जाता । शेष रहता मैं ही ॥ १२ ॥ वहां ब्रह्म आत्मा ईश । मिटती है ऐसी भाष । अबोलका अवकाश । वहं भी नहीं होता ॥ १३ ॥ न बोलना भी है बोलकर । वह भी बोलके मुह भर । जानना न जानना भूलकर । जाना जानना जो ॥ १४ ॥ बोधसे जहां बोध जानना । आनंदसे आनंद भोगना । सुखसे सुख अनुभवना । होता है केवल ॥ १५ ॥ वहां जुडता लाभ लाभमें । मिलती है प्रभा प्रभामें । डूब कर खड़ा विस्मयमें । स्वयं विस्मय ॥ १६ ॥ साम्य हुवा है वहां समसे । विश्राम हुवा है विश्रांतिसे । अनुभव पगलाया है जैसे । अनुभूतिमें ही ॥ १७ ॥ (91) ८१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग